सुप्रीम कोर्ट ने Digital Personal Data Protection Act को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। Digital News Publishers Association का तर्क है कि कानून में पत्रकारिता के लिए छूट न होने से खोजी पत्रकारिता पर बुरा असर पड़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने Digital Personal Data Protection Act (DPDPA) की वैधता की समीक्षा शुरू कर दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और अन्य जजों की बेंच ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर इस कानून के उन प्रावधानों पर जवाब मांगा है, जिनसे मीडिया की आजादी प्रभावित हो सकती है।
मीडिया ऑपरेशंस पर असर
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह है कि मौजूदा कानून में पत्रकारों को कोई विशेष छूट नहीं दी गई है। Indian Express और Times Internet जैसे प्रमुख मीडिया हाउस का कहना है कि किसी व्यक्ति की जांच करने के लिए उनसे 'स्पष्ट सहमति' (Explicit Consent) लेना इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग के लिए बड़ी बाधा है। यदि कानून में बदलाव नहीं होता है, तो जांच के दायरे में आने वाले लोग इस कानून का इस्तेमाल खबरों को रुकवाने या रिकॉर्ड्स को सुरक्षित करने के लिए कर सकते हैं।
निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?
निवेशकों के लिए यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह डिजिटल मीडिया कंपनियों के ऑपरेटिंग माहौल को सीधे प्रभावित करता है। हाई-क्वालिटी इन्वेस्टिगेटिव कंटेंट ही डिजिटल सब्सक्रिप्शन और एडवरटाइजिंग रेवेन्यू का मुख्य जरिया है। यदि मीडिया हाउस को हर खबर के लिए जटिल कंसेंट प्रोसेस से गुजरना पड़ा, तो कंपनी की Compliance कॉस्ट में भारी बढ़ोतरी हो सकती है।
अगली तारीख और उम्मीदें
याचिकाकर्ताओं ने यूरोपीय संघ, यूके और सिंगापुर का उदाहरण दिया है, जहाँ प्रेस के लिए विशेष सुरक्षात्मक प्रावधान मौजूद हैं। अब इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी, जब सरकार अपना पक्ष रखेगी। कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि मीडिया कंपनियों को राहत मिलेगी या रेगुलेटरी सख्ती और बढ़ेगी।
