सुप्रीम कोर्ट इस बात की जांच कर रहा है कि क्या BCCI को 'नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट, 2025' के नियमों का पालन करना चाहिए। इस कानूनी समीक्षा से बोर्ड के कामकाज और प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव हो सकते हैं।
क्या सरकारी दायरे में आएगा BCCI?
सुप्रीम कोर्ट ने BCCI की प्रशासनिक आजादी को लेकर एक बार फिर सख्त रुख अख्तियार किया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अगुवाई में 3 जजों की बेंच ने सुनवाई के दौरान यह अहम सवाल उठाया कि आखिर क्रिकेट बोर्ड और उसकी सहयोगी स्टेट एसोसिएशन 'नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट, 2025' के दायरे से बाहर क्यों हैं। कोर्ट ने बोर्ड से जवाब मांगा है कि क्यों न उन्हें भी इस नए कानून के मानकों का पालन करना चाहिए।
लीडरशिप में बदलाव के संकेत
फिलहाल BCCI 'तमिलनाडु सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट' के तहत काम करता है। अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस नए 2025 एक्ट के पक्ष में आता है, तो बोर्ड के प्रशासनिक ढांचे में बड़ा बदलाव हो सकता है। इसमें ऑफिस-बियरर्स के कार्यकाल और कूलिंग-ऑफ पीरियड (Cooling-off Period) को लेकर नए और सख्त नियम लागू किए जा सकते हैं।
लंबा है कानूनी विवाद का इतिहास
यह मामला साल 2014 से चल रहे कानूनी विवाद का नया अध्याय है। इससे पहले भी RM लोढ़ा कमेटी के जरिए बोर्ड में सुधार की कोशिशें हो चुकी हैं। बीते एक दशक में कोर्ट ने पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कई बार निर्देश दिए हैं, ताकि बोर्ड की पावर को विकेंद्रीकृत (decentralize) किया जा सके।
मीडिया और स्पोर्ट्स इकोसिस्टम पर असर
भले ही BCCI शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनी न हो, लेकिन इसका गवर्नेंस मॉडल पूरे भारतीय स्पोर्ट्स और मीडिया इंडस्ट्री को प्रभावित करता है। बोर्ड के कामकाज का सीधा असर ब्रॉडकास्टिंग राइट्स, स्पॉन्सरशिप और टूर्नामेंट के ऑपरेशन्स पर पड़ता है। मीडिया सेक्टर के इन्वेस्टर्स इस मामले पर पैनी नजर रखे हुए हैं, क्योंकि बोर्ड के फैसलों से कॉन्ट्रैक्ट की स्थिरता सीधे प्रभावित होती है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि बोर्ड सुप्रीम कोर्ट में क्या हलफनामा दाखिल करता है।
