सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट को बच्चों का फंडामेंटल राइट (Fundamental Right) घोषित करते हुए उम्र आधारित पाबंदियों को खारिज कर दिया है। अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को पूरी तरह बैन करने के बजाय, सरकार के नए सेंट्रलाइज्ड सेफ्टी डेटाबेस के तहत एडवांस कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम लागू करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया सेक्टर के लिए एक बड़े बदलाव का संकेत है। अब कंपनियों को केवल उम्र के आधार पर प्रतिबंध लगाने के बजाय, एक सुरक्षित डिजिटल इकोसिस्टम बनाने के लिए अपनी टेक्नोलॉजी में भारी निवेश करना होगा।
डेटाबेस सिंक्रोनाइजेशन की चुनौती
कोर्ट ने पाया कि सुरक्षा व्यवस्था फिलहाल बिखरी हुई है। एक प्लेटफॉर्म से हटाया गया आपत्तिजनक कंटेंट दूसरे प्लेटफॉर्म पर आसानी से मिल जाता है। इस समस्या को सुलझाने के लिए सरकार अब 'परसेप्चुअल हैश' और 'URL' का एक सेंट्रलाइज्ड फ्रेमवर्क तैयार करेगी। इसका मतलब है कि Meta, Alphabet और X जैसी कंपनियों को अपना थ्रेट डेटा रियल-टाइम में शेयर करना होगा और कंटेंट मॉडरेशन को आपस में सिंक्रोनाइज करना होगा।
कंपनियों के लिए बढ़ेगा खर्च
इस नई व्यवस्था का असर इन दिग्गज टेक कंपनियों के फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) के खर्चों पर सीधा पड़ेगा। अब केवल मैन्युअल मॉडरेशन काफी नहीं होगा। इन फर्मों को AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और ऑटोमेटेड सिस्टम्स में बड़े पैमाने पर पैसा लगाना होगा ताकि खतरों को सटीक तरीके से पहचाना जा सके। साथ ही, कोर्ट ने एक मजबूत 'ग्रीवेंस रिड्रेसल' (शिकायत निवारण) सिस्टम पर जोर दिया है, जिसके चलते इन कंपनियों को भारत में अपनी सपोर्ट टीम का विस्तार करना पड़ सकता है।
डेटा गवर्नेंस और जोखिम
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इस सेंट्रलाइज्ड डेटाबेस का इस्तेमाल केवल बच्चों की सुरक्षा के लिए होगा, न कि सर्विलांस के लिए। हालांकि, नियम सख्त होने से डेटा मिसयूज के कानूनी जोखिम भी बढ़ गए हैं। कंपनियों को अब अपने इंटरनल डेटा गवर्नेंस फ्रेमवर्क को बहुत मजबूत रखना होगा। निवेशकों को अब इस पर नजर रखनी चाहिए कि सरकार द्वारा लागू की जाने वाली समय सीमा (Timeline) क्या रहती है और इन कंपनियों के ऑपरेशनल खर्च में कितनी बढ़ोतरी होती है।
