सुप्रीम कोर्ट ने आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन को 2016 के यमुना नदी किनारे हुए कार्यक्रम के लिए लगाया गया ₹5 करोड़ का जुर्माना वापस करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस आयोजन से पर्यावरण को नुकसान पहुंचने के पर्याप्त सबूत नहीं हैं।
आर्ट ऑफ लिविंग को बड़ी राहत!
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के लिए एक बड़ी राहत का आदेश जारी किया है। कोर्ट ने फाउंडेशन द्वारा 2016 में यमुना नदी के किनारे आयोजित 'वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल' के संबंध में लगाए गए ₹5 करोड़ के जुर्माने को वापस करने का निर्देश दिया है।
क्यों लगा था जुर्माना?
यह जुर्माना पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) द्वारा लगाया गया था। NGT को इस बड़े आयोजन के यमुना नदी के बाढ़ क्षेत्र पर पड़ने वाले पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर चिंता थी। कई सालों तक, इस बात पर कानूनी बहस चलती रही कि क्या इस आयोजन के कारण नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को स्थायी नुकसान हुआ है।
कोर्ट का फैसला
अपने नवीनतम फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि उपलब्ध सबूत इस बात को स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे कि आयोजन के दौरान की गई गतिविधियों और स्थायी पर्यावरणीय गिरावट के बीच कोई सीधा संबंध था। चूंकि पारिस्थितिक क्षति के आवश्यक प्रमाण की कमी थी, इसलिए कोर्ट ने जुर्माने की राशि को बनाए रखना अनुचित समझा।
आगे क्या?
आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के लिए, यह न्यायिक निर्णय उनके 2016 के कार्यक्रम से संबंधित एक महत्वपूर्ण और लंबे समय से चले आ रहे कानूनी संघर्ष का अंत करता है। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि संगठन अभी भी अन्य क्षेत्रों में कानूनी चुनौतियों से पूरी तरह मुक्त नहीं है। रिपोर्ट्स के अनुसार, फाउंडेशन और उससे जुड़े ट्रस्ट कर्नाटक हाईकोर्ट में ज़मीन के इस्तेमाल से जुड़े मामलों को लेकर जांच के दायरे में हैं।
फाउंडेशन की कानूनी स्थिति के संबंध में अगला महत्वपूर्ण कदम इन जारी भूमि-उपयोग के मामलों का समाधान होगा। ₹5 करोड़ के जुर्माने की वापसी एक बड़ी बाधा को दूर करती है, लेकिन कानूनी पर्यवेक्षक आगे भी संगठन द्वारा अपनी भूमि प्रबंधन प्रथाओं से संबंधित इन अलग, सक्रिय मुकदमेबाजी के मुद्दों को कैसे प्रबंधित किया जाता है, इस पर नज़र रखेंगे।
