सुप्रीम कोर्ट ने 2013 के POSH एक्ट को लेकर एक बड़ा निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने महिला वकीलों की सुरक्षा के लिए एक विशेष और यूनिफॉर्म फ्रेमवर्क बनाने के लिए कहा है, ताकि देश की सभी अदालतों और ट्रिब्यूनल्स में एक समान नियम लागू हो सकें।
सुप्रीम कोर्ट ने Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, 2013 के तहत लीगल प्रोफेशन के लिए एक स्टैंडडाइज्ड रेगुलेटरी फ्रेमवर्क तैयार करने को कहा है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने माना कि कानून को जिस तरह से अभी लागू किया जा रहा है, वह कानूनी क्षेत्र की काम करने की अनूठी स्थितियों को पूरी तरह कवर नहीं करता है।
वर्तमान में, सुप्रीम कोर्ट जैसे संस्थानों में आंतरिक एंटी-हैरसमेंट नियम केवल विशिष्ट अदालती परिसरों तक ही सीमित हैं। इससे एक बिखरी हुई सुरक्षा व्यवस्था बन गई है, जहां अलग-अलग हाई कोर्ट्स और डिस्ट्रिक्ट ज्यूडिशियरी में सुरक्षा तंत्र अलग-अलग हैं। कोर्ट ने कहा कि इस असंगति के कारण महिला वकीलों को अपनी शिकायतों के निवारण (redressal) के लिए कई बार मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
कॉर्पोरेट जगत के लिए भी यह एक बड़ा संदेश है। जैसे-जैसे कंपनियां ESG (Environmental, Social, and Governance) नियमों को अपना रही हैं, सुप्रीम कोर्ट के ऐसे निर्देश वर्कप्लेस सेफ्टी को और अधिक मजबूत बनाने के लिए एक बेंचमार्क के रूप में काम करेंगे।
कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (Bar Council of India) को निर्देश दिया है कि वह अलग-अलग स्टेट बार एसोसिएशन के साथ मिलकर एक नेशनल पॉलिसी तैयार करे। इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर को तय की गई है, जिसमें इस नए यूनिफॉर्म फ्रेमवर्क पर आगे की चर्चा होगी।
