सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को अगले **4** महीनों के भीतर वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) की फिजिकल मैपिंग पूरी करने का निर्देश दिया है। रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के निवेशकों के लिए यह खबर अहम है क्योंकि इससे जमीन के इस्तेमाल से जुड़े नियमों में सख्ती आएगी और प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में वेटलैंड्स की मैपिंग और सीमांकन (Demarcation) को 4 महीने के भीतर पूरा करने का सख्त आदेश दिया है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की बेंच ने जल स्रोतों के संरक्षण को जन स्वास्थ्य और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'जीवन के अधिकार' के लिए अनिवार्य बताया है।
रियल एस्टेट सेक्टर के लिए जोखिम
रियल एस्टेट, कंस्ट्रक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े निवेशकों के लिए यह निर्देश गेम-चेंजर साबित हो सकता है। अब तक पानी के स्रोतों के पास स्पष्ट लैंड रिकॉर्ड न होने से कानूनी विवाद और देरी आम थी। कोर्ट के 'ग्राउंड-ट्रूथिंग' पर जोर देने का मतलब है कि जो जमीन पहले डेवलपमेंट के लिए चुनी गई थी, अब वह संरक्षित वेटलैंड श्रेणी में आ सकती है।
प्रोजेक्ट्स पर क्या असर होगा?
जिन कंपनियों के पास जलाशयों के आसपास बड़े लैंड बैंक हैं, उन्हें नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। कई प्लॉट संरक्षित क्षेत्रों में आने से कंस्ट्रक्शन गतिविधियों पर रोक लग सकती है या फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI) सीमित हो सकता है। कई मामलों में डेवलपर्स को अतिरिक्त पर्यावरणीय मंजूरी लेनी पड़ सकती है, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ेंगे।
निवेशकों के लिए क्या है 'Monitorable'?
आने वाले महीनों में राज्य सरकारों द्वारा दाखिल किए जाने वाले अनुपालन हलफनामे (Compliance Affidavits) निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होंगे। यदि मैपिंग की प्रक्रिया बहुत सख्त रही, तो रियल एस्टेट डेवलपर्स के लिए रेगुलेटरी बाधाएं बढ़ सकती हैं। निवेशकों को सलाह है कि वे राज्य स्तरीय घोषणाओं पर नजर रखें ताकि यह समझ सकें कि कौन से प्रोजेक्ट्स इन नई सीमाओं की जद में आ रहे हैं।
