Supreme Court ने एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि Prevention of Corruption Act की धारा 17A रिश्वत लेने वाले सरकारी कर्मचारियों को सुरक्षा कवच प्रदान नहीं करती है। अब ऐसे मामलों में जांच के लिए सरकार से पहले अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी।
कानून का गलत फायदा उठाने वालों पर नकेल
जस्टिस S V N Bhatti और जस्टिस N V Anjaria की बेंच ने स्पष्ट किया है कि 2018 में कानून में किया गया संशोधन ईमानदार अफसरों के बचाव के लिए था, न कि भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए। कोर्ट ने कहा कि रिश्वत मांगना, धोखाधड़ी करना या गबन करना सरकारी कर्तव्य नहीं है, बल्कि यह एक आपराधिक कृत्य है। ऐसे में कानून की धारा 17A का हवाला देकर जांच से नहीं बचा जा सकता।
बिजनेस एनवायरनमेंट पर क्या असर?
यह फैसला भारतीय बिजनेस जगत के लिए बड़ी राहत है। अक्सर कंपनियों को सरकारी दफ्तरों से परमिट या लाइसेंस लेने में भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ता है। अब जांच एजेंसियों को रिश्वतखोरी के साफ मामलों में सरकार से 'प्रायर अप्रूवल' (Prior Approval) का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इससे सरकारी तंत्र में जवाबदेही बढ़ेगी और करप्शन के खिलाफ कार्रवाई तेज होगी।
क्या था मामला?
यह फैसला राजस्थान के एक पुलिस कांस्टेबल से जुड़े मामले में आया है, जिसने भ्रष्टाचार के आरोपों में खुद को बचाने के लिए धारा 17A का सहारा लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया है, जिससे अब भविष्य के लिए एक बड़ा कानूनी नजीर (Precedent) स्थापित हो गया है। अब सरकारी कर्मचारी प्रशासनिक फैसलों की आड़ में रिश्वतखोरी को छिपा नहीं पाएंगे।
