सुप्रीम कोर्ट ने शौर्य चक्र अवॉर्डी (Shaurya Chakra awardee) मोहन सिंह की विधवा कुलदीप कौर के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को 26 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद उन्हें असाधारण पारिवारिक पेंशन (extraordinary family pension) देने का आदेश दिया है। साथ ही, कोर्ट ने **₹10 लाख** का अतिरिक्त मुआवज़ा देने का भी निर्देश दिया है।
26 साल बाद न्याय!
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वे शौर्य चक्र अवॉर्डी मोहन सिंह की विधवा कुलदीप कौर को असाधारण पारिवारिक पेंशन और अतिरिक्त मुआवज़ा दें। यह फैसला एक लंबे समय से चले आ रहे पेंशन अधिकारों के विवाद को खत्म करता है।
कौन थे मोहन सिंह?
मोहन सिंह, जनरल रिजर्व इंजीनियरिंग फोर्स (GREF) में एक ओवरसियर थे। साल 2000 में भारत-चीन सीमा के पास एक सड़क परियोजना पर बचाव अभियान के दौरान उन्होंने अपनी जान गंवाई थी। अपने साथियों को बचाते हुए वीरगति प्राप्त करने के लिए उन्हें 2001 में मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था, जो कि शांति काल का तीसरा सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार है।
सरकार के तर्क को SC ने किया खारिज
20 से अधिक वर्षों तक, सरकार ने असाधारण पारिवारिक पेंशन के दावे को यह कहकर खारिज कर दिया था कि Workmen's Compensation Act के तहत पहले से भुगतान किए गए मुआवज़े के कारण परिवार आगे के लाभों के लिए पात्र नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को ठुकरा दिया। जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने फैसला सुनाया कि मोहन सिंह की मृत्यु Central Civil Services (Pension) Rules के कैटेगरी C के तहत आती है, जिसके अनुसार परिवार को अन्य भुगतान की परवाह किए बिना असाधारण पेंशन का हक़ है।
पेंशन के अलावा ₹10 लाख का मुआवज़ा
पेंशन के अतिरिक्त, कोर्ट ने कुलदीप कौर को ₹10 लाख की एकमुश्त राशि का भुगतान करने का आदेश दिया। यह राशि उस ₹14.28 लाख की मूल राशि और ₹4.12 लाख के बकाया के अतिरिक्त है, जिसका भुगतान सरकार पहले ही अदालती निर्देशों के बाद कर चुकी थी। मामले को अंतिम रूप देने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया, जो न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश पारित करने की अनुमति देता है।
यह फैसला इस बात की याद दिलाता है कि सेवा कर्मियों के परिवारों को अक्सर लाभ प्राप्त करने में प्रशासनिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि कानूनी प्रक्रिया में हुई देरी का इस्तेमाल विधवा को राहत देने से इनकार करने के बहाने के रूप में नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वालों के परिवारों के लिए ऐसे लंबे संघर्ष अस्वीकार्य हैं।
