सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत वैवाहिक रेप (Marital Rape) को लेकर अपवाद की संवैधानिकता पर सुनवाई शुरू कर दी है। कोर्ट ने साफ कहा है कि शादी का मतलब महिला की व्यक्तिगत स्वायत्तता का खत्म होना नहीं है। इस मामले में अंतिम बहस तीन सप्ताह बाद शुरू होगी।
बुधवार, 9 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक रेप अपवाद की संवैधानिक वैधता की जांच के लिए सुनवाई शुरू की। यह कानूनी प्रावधान, जो IPC की धारा 375 के अपवाद 2 और नई भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 में निहित है, लंबे समय से बहस का विषय रहा है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ इस मामले की अध्यक्षता कर रही है। सुनवाई के दौरान, बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि विवाह का अर्थ महिला की व्यक्तिगत स्वायत्तता का अंत नहीं है। यह टिप्पणी दर्शाती है कि कोर्ट इस बात की बारीकी से समीक्षा कर रहा है कि क्या यह अपवाद शारीरिक अखंडता के संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप है।
कानूनी रास्ता और रणनीति
सुप्रीम कोर्ट ने व्यापक संवैधानिक चुनौती पर कूदने के बजाय एक दो-चरणीय दृष्टिकोण अपनाया है। बेंच ने सबसे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट की एक अपील पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया है, जिसमें एक पति पर गंभीर दुर्व्यवहार के आरोप हैं। कोर्ट यह जांचना चाहता है कि क्या मौजूदा कानून में ऐसे कृत्यों पर मुकदमा चलाने का प्रावधान है या कानून में किसी ठोस बदलाव की आवश्यकता है।
सरकार का रुख
इस मामले ने न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच मतभेद को उजागर किया है। केंद्र सरकार का मानना है कि वैवाहिक रेप का अपराधीकरण करना एक विधायी नीति है और इस पर निर्णय लेना संसद का काम है। सरकार का तर्क है कि मौजूदा अपवाद विवाह की संस्था की रक्षा के लिए है और इसे हटाने से कानून का दुरुपयोग बढ़ सकता है।
कोर्ट ने सभी पक्षों को अपनी दलीलें समेकित करने का निर्देश दिया है। मामले की अंतिम सुनवाई तीन सप्ताह बाद हर बुधवार और गुरुवार को आयोजित की जाएगी, जो यह तय करेगा कि कोर्ट इस अपवाद को हटाता है या फैसला संसद पर छोड़ता है।
