Supreme Court ने 'तलाक-ए-हसन' और अन्य एकतरफा तलाक की प्रथाओं को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में इन प्रथाओं को असंवैधानिक बताते हुए समान और जेंडर-न्यूट्रल गाइडलाइंस की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत एकतरफा तलाक की प्रथाओं की फिर से समीक्षा शुरू कर दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर इस मामले में औपचारिक जवाब मांगा है। यह मामला उस याचिका से जुड़ा है जिसमें 'तलाक-ए-हसन' की कानूनी वैधता को चुनौती दी गई है।
संवैधानिक आधार पर चुनौती
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मौजूदा तलाक के तरीके बिना किसी वैधानिक विनियमन (statutory regulation) के काम कर रहे हैं, जो मनमाना है। इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन बताया गया है, जो कानून के समक्ष समानता, लिंग के आधार पर भेदभाव न करने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।
क्या है मांग?
याचिका में 'मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) एप्लीकेशन एक्ट, 1937' की धारा 2 को चुनौती दी गई है। इसके साथ ही, 'तलाक-ए-हसन' के अलावा बहुविवाह (polygamy) की प्रथा पर भी चिंता जताई गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि स्पष्ट कानूनी नियमों के अभाव में महिलाओं और बच्चों की आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा खतरे में रहती है, इसलिए अदालत को जेंडर-जस्ट गाइडलाइंस बनानी चाहिए।
यह घटनाक्रम 2017 के उस ऐतिहासिक फैसले की याद दिलाता है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 'ट्रिपल तलाक' को असंवैधानिक करार दिया था। अब सभी की निगाहें सरकार के जवाब पर टिकी हैं कि वे इस संवेदनशील कानूनी मामले पर क्या रुख अपनाते हैं।
