सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की **24 घंटे** की समय सीमा, पुलिस रिकॉर्ड में गिरफ्तारी दर्ज होने से नहीं, बल्कि हिरासत में लिए जाने के पहले पल से ही शुरू हो जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 22(2) का हवाला देते हुए एक ऐतिहासिक निर्देश जारी किया है। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने साफ कर दिया है कि पुलिस अब 'इनफॉर्मल कस्टडी' या गिरफ्तारी को रिकॉर्ड करने में देरी का बहाना बनाकर कानून से नहीं बच सकेगी।\n\n### 'बफर पीरियड' का खेल खत्म\nअक्सर जांच एजेंसियां किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के बाद उसे आधिकारिक तौर पर गिरफ्तार दिखाने में देरी करती थीं, ताकि वे कानूनी समय सीमा से बच सकें। कोर्ट ने इस 'आर्टिफिशियल गैप' को असंवैधानिक करार दिया है। अब 24 घंटे की गिनती उस वक्त से ही शुरू होगी जब व्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहली बार रोक लगाई गई हो। इस गणना में केवल वही समय घटाया जा सकेगा जो हिरासत स्थल से मजिस्ट्रेट कोर्ट तक पहुंचने में लगता है।\n\n### सुजीत दास केस से आया बदलाव\nयह फैसला 'सुजीत दास बनाम भारत संघ' मामले में आया, जो NDPS एक्ट से जुड़ा था। मामले में 29 सितंबर, 2025 को छापेमारी के दौरान व्यक्तियों को पकड़ा गया, लेकिन गिरफ्तारी अगले दिन दर्ज की गई। कोर्ट ने इसे प्रक्रिया का उल्लंघन मानते हुए स्पष्ट किया कि जांच एजेंसियों को अब मजिस्ट्रेट के सामने यह साबित करना होगा कि गिरफ्तारी के समय मौलिक अधिकारों का हनन नहीं हुआ है।\n\n### एजेंसियों के लिए क्या हैं नए निर्देश?\nमजिस्ट्रेट्स को निर्देश दिए गए हैं कि वे आरोपियों के पेश होने पर हिरासत में लिए जाने के सटीक समय की स्वतंत्र रूप से जांच करें। यह आदेश न केवल जांच एजेंसियों के लिए एक बड़ा झटका है, बल्कि यह पारदर्शिता और कानूनी जवाबदेही की दिशा में एक कड़ा कदम है। अब कानून का डंडा उन अधिकारियों पर भी चलेगा जो संवैधानिक समय सीमा के साथ खिलवाड़ करने की कोशिश करते हैं।
