राज्यसभा में आज सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा हो रही है। इस बिल का मकसद सुप्रीम कोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 करना है। इस कदम से 92,000 से ज़्यादा लंबित मामलों से निपटने में मदद मिलेगी, लेकिन सांसद न्यायिक विविधता और नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी बहस कर रहे हैं।
जजों की संख्या बढ़ाने की तैयारी
राज्यसभा में सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा शुरू हो गई है। इस विधेयक के पारित होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में जजों की कुल संख्या 34 से बढ़कर 38 हो जाएगी। यह कदम चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की उसUrgent मांग के जवाब में उठाया गया है, जिसमें उन्होंने बढ़ते केसों के बोझ को देखते हुए जजों की संख्या बढ़ाने का आग्रह किया था। यह बिल मई 2026 में जारी किए गए एक अध्यादेश (Ordinance) के बाद आया है।
कारोबार और अर्थव्यवस्था पर असर
कानूनी व्यवस्था का सुचारू रूप से काम करना किसी भी कारोबार और अर्थव्यवस्था के लिए बेहद ज़रूरी है। सुप्रीम कोर्ट में अकेले 92,000 से ज़्यादा मामले लंबित हैं। ऐसे में मामलों के निपटारे में देरी, कॉन्ट्रैक्ट लागू होने में दिक्कत और व्यावसायिक विवादों का बढ़ना आम है। जजों की संख्या बढ़ाकर सरकार कोर्ट की केस निपटाने की क्षमता को बढ़ाना चाहती है, जिससे व्यापार और अन्य कानूनी मामलों के लिए एक ज़्यादा कुशल ढांचा तैयार हो सके।
नियुक्तियों पर उठे सवाल
संख्या बढ़ाने के अलावा, सदन में जजों की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए गए। विपक्षी सदस्यों ने उच्च न्यायपालिका में महिलाओं, दलितों (Scheduled Castes), आदिवासियों (Scheduled Tribes) और अन्य वंचित समुदायों के कम प्रतिनिधित्व पर चिंता जताई। सांसदों का कहना है कि सच्ची न्याय व्यवस्था के लिए सामाजिक विविधता ज़रूरी है और मौजूदा नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है।
कोलेजियम सिस्टम पर बहस
जजों की नियुक्ति के लिए इस्तेमाल होने वाले कोलेजियम सिस्टम (Collegium System) पर भी काफी मतभेद हैं। कई सांसदों ने इस प्रक्रिया पर कड़ी आपत्ति जताई और जवाबदेही व पारदर्शिता की मांग की। कुछ सदस्यों ने सुझाव दिया कि सिविल सेवा परीक्षाओं की तरह, एक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा आयोग (All-India Judicial Service Commission) का गठन किया जाना चाहिए ताकि जजों की भर्ती प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया जा सके।
सरकार का पक्ष
संसदीय कार्य मंत्री ने स्पष्ट किया कि हालांकि सरकार नियुक्ति की सूचना जारी करती है, लेकिन नामों का चयन कोलेजियम की जिम्मेदारी है। यह बयान सरकार और न्यायपालिका के बीच नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर चल रही बहस को दर्शाता है।
आगे क्या?
संख्या और विविधता के अलावा, अदालतों की क्षेत्रीय बेंच (Regional Benches) की ज़रूरत और जजों की सेवानिवृत्ति आयु (Retirement Age) पर पुनर्विचार जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई। जजों की संख्या बढ़ाना एक अहम कदम है, लेकिन यह देखना होगा कि नियुक्तियां कैसे होती हैं और क्या बढ़ी हुई क्षमता से मामलों का निपटारा तेज़ी से हो पाता है। सबसे महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि क्या ये बदलाव न्यायिक देरी की समस्या को प्रभावी ढंग से कम कर पाते हैं।
