राजस्थान एंटी-करप्शन ब्यूरो ने IAS अधिकारी शिखर अग्रवाल और IPS अधिकारी प्रशाखा माथुर के खिलाफ जांच शुरू की है। मामला Goyal Fashions के साथ हुए संदिग्ध प्रॉपर्टी सौदों और सरकारी शक्तियों के कथित दुरुपयोग से जुड़ा है, जो निवेशकों के लिए गवर्नेंस रिस्क का एक बड़ा सबक है।
राजस्थान एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) ने भ्रष्ट आचरण और पद के दुरुपयोग के आरोपों के बाद IAS अधिकारी शिखर अग्रवाल और उनकी पत्नी IPS अधिकारी प्रशाखा माथुर की घेराबंदी तेज कर दी है। राज्य सरकार ने 'प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट' के तहत जांच की मंजूरी दे दी है, जिसके बाद इन अधिकारियों के इंडस्ट्रियल डिपार्टमेंट में रहे कार्यकाल की भी बारीकी से पड़ताल की जा रही है।
रिसॉर्ट डील का पूरा खेल
जांच का केंद्र Goyal Fashions Private Limited द्वारा संचालित 40 विला और कॉटेज हैं। आरोप है कि दंपत्ति और उनके परिवार ने सितंबर 2023 से मार्च 2026 के बीच इन्हें करीब ₹6.16 करोड़ में खरीदा। जांच एजेंसी यह पता लगा रही है कि बाजार भाव से कम कीमत पर यह प्रॉपर्टी क्यों बेची गई।
रेंटल इनकम और 'क्विड प्रो को' (Quid Pro Quo)
खरीद के बाद इन प्रॉपर्टीज को कंपनी को ही लीज पर दे दिया गया, जिससे सालाना ₹1.8 करोड़ की रेंटल इनकम मिलने लगी। एजेंसी अब इस वित्तीय ढांचे को एक 'क्विड प्रो को' सौदे के तौर पर देख रही है। चौंकाने वाली बात यह है कि मार्च 2026 में जिस दिन दंपत्ति ने अलवर रिसॉर्ट में 20 विला रजिस्टर कराए, उसी दिन राज्य सरकार ने उस कंपनी को एक बड़ा फाइनेंशियल पैकेज जारी किया था। अब जांच इस पर है कि क्या सरकारी मंजूरी और पर्यावरण क्लीयरेंस इन प्रॉपर्टी सौदों के बदले में मिली थी।
निवेशकों के लिए सबक
यह मामला गवर्नेंस और पारदर्शिता की अहमियत को दर्शाता है। किसी भी कंपनी में अगर उसकी ग्रोथ ऑपरेशनल परफॉर्मेंस के बजाय सरकारी अधिकारियों से करीबी संबंधों या शॉर्टकट पर टिकी हो, तो वह एक बड़ा रेड फ्लैग है। निवेशकों को हमेशा 'रिलेटेड-पार्टी ट्रांजेक्शन' और ऐसे सौदों पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि गवर्नेंस फेलियर सीधे तौर पर कंपनी की साख और शेयर की वैल्यू पर भारी चोट पहुंचा सकता है।
