दिल्ली में 20 जुलाई को हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) द्वारा 'प्लास्टिक पेलेट्स' के इस्तेमाल की पुष्टि पुलिस रिकॉर्ड से हुई है। यह खुलासा पहले के सरकारी बयानों के बिल्कुल विपरीत है और इसने एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। अब सुरक्षा बलों के उपकरणों की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
क्या सच में RAF ने चलाए 'प्लास्टिक पेलेट्स'?
दिल्ली की सड़कों पर 20 जुलाई, 2026 को हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) द्वारा इस्तेमाल किए गए हथियारों को लेकर नया खुलासा हुआ है। संसद मार्ग पुलिस स्टेशन के एक सामान्य डायरी (General Diary) में दर्ज जानकारी के अनुसार, RAF के जवानों ने एक डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (DCP) रैंक के अधिकारी के निर्देश पर दो राउंड 'प्लास्टिक पेलेट्स' दागे थे।
सरकारी बयानों से पलटा खेल!
यह जानकारी इसलिए चौंकाने वाली है क्योंकि इससे पहले अधिकारियों ने ऐसे किसी भी हथियार के इस्तेमाल से साफ इनकार किया था। इस खुलासे के बाद, सुरक्षा बलों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले भीड़ नियंत्रण उपायों को लेकर पहले के आधिकारिक खंडन पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस घटना ने एक राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है और सुरक्षा बलों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरणों की प्रकृति पर भी सवाल उठाए हैं। प्रदर्शनकारियों ने इस दौरान चोटिल होने की बात कही है, जिससे मामले की जांच और सार्वजनिक पड़ताल और तेज हो गई है।
गोलियों का रहस्य: कहाँ से आए?
इस पूरे मामले का एक बड़ा रहस्य यह भी है कि ये 'प्लास्टिक पेलेट्स' आए कहाँ से? कई पक्षों द्वारा जांच के बावजूद, किसी भी बड़े घरेलू हथियार निर्माता, यहां तक कि सरकारी कंपनी Munitions India Limited (MIL) ने भी 'प्लास्टिक पेलेट्स' के निर्माण या सप्लाई की पुष्टि नहीं की है। इस तरह के गोला-बारूद के लिए कोई स्पष्ट रिकॉर्ड या निर्माता का पता न होना, आम जनता के लिए एक बड़ी पहेली बन गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य 12-बोर की गोलियों में आमतौर पर अलग सामग्री का इस्तेमाल होता है। इन खास राउंड की खरीद और वितरण को लेकर दस्तावेजों की कमी एक बड़ा विवाद का मुद्दा बनी हुई है।
पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग
यह घटना, भीड़ नियंत्रण में गैर-घातक और कम-घातक हथियारों के इस्तेमाल पर चल रही बहस को और तेज करती है। कानूनी विशेषज्ञों और नागरिक समाज समूहों ने मांग की है कि इन गोला-बारूद को कब और क्यों अधिकृत किया गया, इसकी न्यायिक जांच होनी चाहिए। साथ ही, केंद्रीय गृह मंत्रालय से भी इस बारे में आधिकारिक बयान जारी करने की मांग की जा रही है ताकि सुरक्षा बलों की उपकरण नीति स्पष्ट हो सके।
फिलहाल, सभी की निगाहें लंबित याचिकाओं और संभावित आधिकारिक जांच के नतीजों पर टिकी हैं। यह जानना अहम होगा कि क्या ये 'प्लास्टिक पेलेट्स' सुरक्षा बलों के नियमित हथियारों का हिस्सा हैं, या फिर भीड़ नियंत्रण के लिए बिना दस्तावेजी रिकॉर्ड वाले हथियार हैं। यह आम जनता की सुरक्षा और सरकारी जवाबदेही के लिए एक महत्वपूर्ण पहलू है।
