Pune ITAT ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि स्वैच्छिक रिटायरमेंट (VRS) के तहत मिला **₹65.21 लाख** का अमाउंट टैक्स-फ्री 'कैपिटल रिसिप्ट' है। यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत है जिन्हें कंपनी बंद होने या रीस्ट्रक्चरिंग के दौरान भारी पेआउट मिलता है।
पुणे इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) ने एक अहम टैक्स स्पष्टीकरण जारी किया है। ट्रिब्यूनल ने साफ कर दिया है कि कंपनी से रिटायरमेंट पर मिला ₹65.21 लाख का अमाउंट पूरी तरह से टैक्स-फ्री होगा। यह केस Pfizer Healthcare India के एक पूर्व कर्मचारी से जुड़ा है, जिन्हें प्लांट बंद होने के बाद यह राशि मिली थी।
टैक्स विवाद की असली जड़
इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने इस रकम को 'Income from Other Sources' के तहत टैक्सेबल बनाने की कोशिश की थी। विभाग का तर्क था कि यह कमाई पर टैक्स लगना चाहिए। लेकिन ट्रिब्यूनल ने कंपनी की रिटायरमेंट स्कीम की शर्तों की बारीकी से जांच की। जांच में पाया गया कि एग्रीमेंट में इसे 'स्वैच्छिक इस्तीफा' (Voluntary Resignation) माना गया था, न कि कंपनी द्वारा थोपी गई छंटनी। चूंकि यह एग्जिट स्वैच्छिक था, इसलिए इसे 'कैपिटल रिसिप्ट' माना गया है, जिस पर सामान्य सैलरी की तरह टैक्स नहीं लगता।
गलत रिपोर्टिंग के बावजूद राहत
इस मामले में एक ट्विस्ट तब आया जब पता चला कि टैक्सपेयर ने अपनी ITR फाइलिंग में गलती से इस रकम को 'एडवांस सैलरी' के रूप में दिखा दिया था। ट्रिब्यूनल ने बड़ी राहत देते हुए कहा कि अगर रिपोर्टिंग में अनजाने में कोई गलती हुई है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि टैक्सपेयर अपनी कानूनी छूट का दावा नहीं कर सकता। ट्रिब्यूनल के अनुसार, रिपोर्टिंग के फॉर्म से ज्यादा जरूरी 'हकीकत' (Substance) होती है, इसलिए टैक्सपेयर को टैक्स-फ्री स्टेटस क्लेम करने की मंजूरी दी गई।
टैक्सपेयर्स के लिए सीख
यह फैसला दिखाता है कि जब आप कंपनी छोड़ते हैं, तो एग्जिट डॉक्यूमेंट्स में लिखी भाषा कितनी मायने रखती है। 'स्वैच्छिक इस्तीफा' और 'अनिवार्य छंटनी' के बीच का फर्क यह तय करता है कि आपके हाथ में आई रकम पर टैक्स लगेगा या नहीं। ट्रिब्यूनल का यह फैसला एक मजबूत मिसाल पेश करता है, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस तरह के मामलों में अपने एग्जिट एग्रीमेंट को कानूनी विशेषज्ञों से जरूर चेक करवाना चाहिए ताकि टैक्स की उलझनों से बचा जा सके।
