Bombay High Court ने गड्ढों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अब राज्य प्रशासन की जवाबदेही तय करते हुए कोर्ट ने मुआवजे के नियम साफ कर दिए हैं, जिसके तहत जान जाने पर **₹6 लाख** और चोट लगने पर **₹50,000** से **₹2.5 लाख** तक का क्लेम मिल सकता है।
सड़क सुरक्षा और नागरिक अधिकारों को लेकर अक्टूबर 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सुरक्षित सड़कें मुहैया कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है और वे इसके लिए ठेकेदारों पर दोष मढ़कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते। यह फैसला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत आता है।
मुआवजा और जवाबदेही
कोर्ट ने मुआवजे का एक स्पष्ट ढांचा तैयार किया है। अगर गड्ढों की वजह से किसी व्यक्ति की जान जाती है, तो परिजनों को ₹6 लाख का मुआवजा दिया जाएगा। वहीं, चोट लगने की स्थिति में गंभीरता के अनुसार ₹50,000 से ₹2.5 लाख तक की राशि तय की गई है। इस नियम से सरकारी एजेंसियों की जवाबदेही तय होगी।
लॉजिस्टिक्स और कारोबार पर असर
खराब सड़कों का सीधा असर लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन पर पड़ता है। वाहन टूटने, दुर्घटनाओं और देरी के कारण परिचालन लागत (ऑपरेटिंग कॉस्ट) बढ़ जाती है। कोर्ट के इस सख्त रुख से उम्मीद है कि प्रशासन अब सड़क की गुणवत्ता को प्राथमिकता देगा, जिससे अंततः व्यापार करने की सुगमता (Ease of Doing Business) में सुधार होगा।
लापरवाही कैसे साबित करें?
मुआवजा पाने के लिए ठोस सबूत जरूरी हैं। दुर्घटना स्थल की तारीख वाली तस्वीरें, पुलिस रिपोर्ट (FIR), मेडिकल बिल और गाड़ी की मरम्मत की रसीदें संभालकर रखना अनिवार्य है।
आम नागरिक क्या करें?
कानूनी लड़ाई से पहले, नागरिक CPGRAMS या 'Meri Sadak' जैसे डिजिटल पोर्टल्स का उपयोग करके शिकायत दर्ज करा सकते हैं। यह शिकायत समय पर की गई कार्रवाई का एक आधिकारिक रिकॉर्ड बनाती है, जो आगे चलकर कोर्ट में केस को मजबूती देने में काम आती है।
