Parliament Panel Report: डायरेक्टर्स की उम्र सीमा में बड़ी बदलाव की सिफारिश! 18 साल में बन सकेंगे MD

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Parliament Panel Report: डायरेक्टर्स की उम्र सीमा में बड़ी बदलाव की सिफारिश! 18 साल में बन सकेंगे MD

संसद की एक स्थायी समिति ने कंपनियों के कानून को आधुनिक बनाने के लिए बड़ा सुझाव दिया है। समिति ने मैनेजिंग डायरेक्टर्स (MD) और होल-टाइम डायरेक्टर्स के लिए न्यूनतम उम्र सीमा घटाकर **18 साल** करने की सिफारिश की है, जबकि अधिकतम उम्र सीमा **75 साल** तक बढ़ाई जा सकती है। इसके अलावा, इनसॉल्वेंसी (दिवालियापन) के मामलों को तेजी से निपटाने के लिए NCLT की खास बेंच बनाने और विदेशी कंपनियों के लिए भारत के GIFT City में आने के नियमों को आसान बनाने का भी सुझाव दिया गया है।

कॉर्पोरेट गवर्नेंस (Corporate Governance) के नियमों को और बेहतर बनाने के लिए संसद की एक संयुक्त समिति ने कंपनियों के कानून (Companies Act) में कई अहम बदलावों का प्रस्ताव दिया है। समिति, जिसकी अगुवाई सुधीर गुप्ता कर रहे हैं, ने डायरेक्टर्स बनने के लिए न्यूनतम उम्र सीमा को 21 साल से घटाकर 18 साल करने की सिफारिश की है। इस कदम का मकसद भारत के नियमों को अमेरिका, जर्मनी और सिंगापुर जैसे देशों के बराबर लाना है, ताकि युवा उद्यमी और उत्तराधिकारी कम उम्र में ही कंपनी की कमान संभाल सकें।

डायरेक्टर्स की उम्र सीमा और गवर्नेंस में बदलाव

न्यूनतम उम्र कम करने के साथ-साथ, समिति ने डायरेक्टर्स के लिए अधिकतम उम्र सीमा को 70 साल से बढ़ाकर 75 साल करने का सुझाव दिया है। इसके लिए अब स्पेशल रेजोल्यूशन (Special Resolution) की जरूरत नहीं होगी। यह बदलाव अनुभवी लीडर्स को बोर्ड में बनाए रखने के बड़े दृष्टिकोण को दर्शाता है। समिति ने कॉर्पोरेट लॉ को और डिक्रिमिनलाइज (Decriminalize) करने पर भी जोर दिया है। नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी (NFRA) को खत्म करने के बजाय, समिति का मानना है कि इसके पेनल्टी प्रोविजन्स (Penalty Provisions) को और मजबूत किया जाना चाहिए।

इनसॉल्वेंसी (Insolvency) और कॉर्पोरेट मोबिलिटी पर फोकस

दिवालियापन से जुड़े मामलों में देरी को कम करने के लिए, समिति ने इनसॉल्वेंसी (Insolvency) के केस के लिए नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की अलग से विशेष बेंच बनाने का समर्थन किया है। इसका लक्ष्य इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत रेजोल्यूशन टाइमलाइन (Resolution Timelines) का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना है, जिससे डूबे हुए एसेट्स (Distressed Assets) का मूल्य बचाया जा सके और नियमित बेंचों पर बोझ कम हो।

समिति ने विदेशी कंपनियों के लिए भारत के इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर्स (IFSC) यानी GIFT City में 'रिवर्स-फ्लिपिंग' (Reverse-Flipping) यानी वापस भारत आने की प्रक्रिया को आसान बनाने का रोडमैप भी तैयार किया है। इसका उद्देश्य उन भारतीय प्रमोटर्स को प्रोत्साहित करना है जिनकी विदेशी कंपनियां हैं, वे अपना बेस भारत वापस ले आएं। इसके लिए कैपिटल गेन्स (Capital Gains) और टैक्सेशन (Taxation) को लेकर एक स्पष्ट कानूनी ढांचा जरूरी होगा। कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के मामले में, समिति ने नेट प्रॉफिट (Net Profit) की सीमा 10 करोड़ रुपये रखने और छोटी कंपनियों को इन-काइंड (In-kind) डोनेशन में अधिक लचीलापन देने की सिफारिश की है।

निवेशकों और कंपनियों को इन सुझावों पर नजर रखनी चाहिए क्योंकि ये जल्द ही विधायी चरण (Legislative Phase) में जा सकते हैं। यह देखना अहम होगा कि ये बदलाव कंपनियों के बोर्ड स्ट्रक्चर (Board Structures), इनसॉल्वेंसी की कार्यवाही और कंपनियों के भारत लौटने की प्रक्रिया को कैसे प्रभावित करते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.