केंद्र सरकार ने संसद में **Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026** पेश किया है। इस नए बिल का मकसद NGOs को मिलने वाले विदेशी चंदे पर शिकंजा कसना और सरकारी निगरानी बढ़ाना है। बिल में लाइसेंस रद्द होने पर संपत्तियों के मैनेजमेंट के लिए 'डेजिग्नेटेड अथॉरिटी' बनाने और रजिस्ट्रेशन रिन्यूअल के लिए मिनिमम खर्च की शर्त रखी गई है।
नई निगरानी व्यवस्था और अथॉरिटी का गठन
इस नए कानून के तहत, केंद्र सरकार एक 'डेजिग्नेटेड अथॉरिटी' का गठन करेगी। अगर किसी NGO का FCRA रजिस्ट्रेशन कैंसिल हो जाता है या रिन्यूअल नहीं होता है, तो यह अथॉरिटी उस NGO के विदेशी फंड्स और प्रॉपर्टी को अपने कंट्रोल में ले सकेगी। सरकार का कहना है कि 2019 से 2022 के बीच NGOs को करीब ₹55,741 करोड़ का विदेशी चंदा मिला है, और इस पैसे का सही इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया गया है।
रजिस्ट्रेशन के लिए नई शर्तें
बिल में यह भी प्रावधान है कि NGO अपना रजिस्ट्रेशन रिन्यू कराने के लिए पिछले दो फाइनेंशियल ईयर में कम से कम ₹10 लाख फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन का इस्तेमाल दिखाना होगा। सरकार का मानना है कि इससे सिर्फ एक्टिव NGOs ही विदेशी फंडिंग जारी रख पाएंगे।
पारदर्शिता और विरोध की चिंताएं
नए नियमों के तहत, NGOs को प्रोजेक्ट लोकेशन, ऑनलाइन प्रेजेंस और सोशल मीडिया एक्टिविटी की भी विस्तृत जानकारी देनी होगी। हालांकि, सरकार का दावा है कि इससे जवाबदेही बढ़ेगी, लेकिन विपक्ष और कुछ नागरिक समाज समूहों ने इस पर चिंता जताई है। PRS Legislative Research जैसे संगठनों का मानना है कि यह बिल सरकारी शक्तियों का दुरुपयोग बढ़ा सकता है और 'डेजिग्नेटेड अथॉरिटी' के अधिकारों का गलत इस्तेमाल हो सकता है।
यह बिल पहले भी टाल दिया गया था और अब मॉनसून सेशन में इस पर बहस होने की उम्मीद है। सरकार का कहना है कि जो संस्थाएं सही काम कर रही हैं, उन्हें डरने की जरूरत नहीं है, लेकिन रेगुलेटरी ट्रांसपेरेंसी और NGO की स्वतंत्रता के बीच संतुलन एक अहम मुद्दा बना रहेगा।
