मुजफ्फरनगर के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज रवि कुमार दिवाकर ने अपने कोर्ट से **97** लंबित क्रिमिनल केस ट्रांसफर करने के प्रशासनिक आदेश को चुनौती दी है। जज का तर्क है कि बिना ठोस कानूनी आधार के चल रहे मामलों को हटाना न्यायिक स्वतंत्रता के लिए खतरा है।
मुजफ्फरनगर डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में उस समय हलचल मच गई जब एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज रवि कुमार दिवाकर ने अपने पास लंबित 97 क्रिमिनल केसों को प्रशासनिक आदेश के तहत हटाए जाने पर कड़ा ऐतराज जताया। ये मामले 18 अगस्त को जारी 9 अलग-अलग आदेशों के जरिए ट्रांसफर किए गए थे, जो कि उस समय के तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज के रिटायर होने से ठीक पहले हुए थे।
न्यायिक स्वतंत्रता का मुद्दा
एक नारकोटिक्स मामले में 35 पन्नों के बरी करने वाले ऑर्डर में जज दिवाकर ने इस कार्रवाई की वैधता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब बिना किसी पारदर्शी कारण या ठोस कानूनी तर्क के 'पार्ट-हियर्ड' (सुनवाई के बीच में अटके) मामलों को शिफ्ट किया जाता है, तो इससे न्यायिक अधिकारियों की स्वायत्तता पर आंच आती है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अधिकारियों को ऐसे निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए जिनमें प्रक्रिया का स्पष्ट अभाव हो।
आम आदमी पर असर
जज ने इस प्रशासनिक बदलाव से होने वाले मानवीय नुकसान की ओर भी इशारा किया। उन्होंने अशोक भारती नाम के एक प्रतिवादी का उदाहरण दिया, जिसका ट्रायल 10 साल से अधिक समय से चल रहा था। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रक्रियात्मक अस्थिरता न केवल न्याय में देरी करती है, बल्कि यह कानूनी प्रक्रिया को ही मानसिक उत्पीड़न का जरिया बना देती है। जज ने यह भी आशंका जताई कि किसी नए जज द्वारा इन मामलों पर सुनाए गए फैसलों की कानूनी वैधता पर भी सवाल उठ सकते हैं।
अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस बड़े पैमाने पर हुए ट्रांसफर के पीछे का ठोस कारण स्पष्ट किया जाएगा, या यह विवाद न्यायपालिका के अंदरूनी प्रबंधन बनाम न्यायिक स्वतंत्रता के एक बड़े बहस का विषय बन जाएगा।
