उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर ज़िला कोर्ट ने अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच 10 अलग-अलग मामलों में 22 लोगों को मौत की सज़ा सुनाई है। एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज रवि कुमार दिवाकर की बेंच ने हत्या और लूट जैसे गंभीर अपराधों में ये फैसले सुनाए हैं। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत, सेशन कोर्ट द्वारा दी गई मौत की सज़ा को हाई कोर्ट से कन्फर्म कराना ज़रूरी होता है।
मुज़फ्फरनगर कोर्ट का बड़ा फैसला
उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर ज़िला कोर्ट पिछले चार महीनों में सख्त रवैये के साथ फैसले सुना रहा है। अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच, एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज रवि कुमार दिवाकर ने कुल 10 आपराधिक मामलों में 22 लोगों को मौत की सज़ा सुनाई है। इन मामलों में कई हत्याएं, लोक सेवकों की हत्या और हाईवे पर लूटपाट जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं।
यह सिलसिला अप्रैल की शुरुआत में शुरू हुआ और अगस्त तक जारी रहा, जिसमें कई मौत की सज़ाएं तेज़ी से सुनाई गईं। एक खास मामला 1999 के पुराने केस से जुड़ा था, जिसमें कोर्ट ने एक व्यापारी के अपहरण और हत्या के दोषी को लगभग 27 साल बाद मौत की सज़ा सुनाई। वहीं, अगस्त 2026 के एक हालिया केस में शामली ज़िला में 2014 की हत्या के मामले में चार लोगों को सज़ा सुनाई गई।
कानूनी प्रक्रिया और हाई कोर्ट की भूमिका
भारतीय कानूनी प्रावधानों, खासकर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के अनुसार, सेशन कोर्ट द्वारा सुनाई गई मौत की सज़ा अंतिम नहीं होती। मौत की सज़ा को लागू करने से पहले संबंधित हाई कोर्ट से इसकी पुष्टि (Confirmation) कराना अनिवार्य है। यह एक अहम कानूनी सुरक्षा उपाय है जिससे यह सुनिश्चित होता है कि गंभीर आपराधिक मामलों की अपील की सुनवाई ठीक से हो।
'दुर्लभ से दुर्लभतम' सिद्धांत पर चर्चा
इस ज़िला कोर्ट में मौत की सज़ाओं की इतनी ज़्यादा संख्या ने कानूनी विशेषज्ञों और आम जनता का ध्यान खींचा है। इन सज़ाओं का मूल्यांकन 'दुर्लभ से दुर्लभतम' (Rarest of Rare) सिद्धांत के तहत किया जाता है। यह एक न्यायिक दिशानिर्देश है जिसका उद्देश्य मौत की सज़ा को केवल सबसे जघन्य और चरम अपराधों तक सीमित रखना है। इन फैसलों से न्यायपालिका में इस सिद्धांत के लगातार कार्यान्वयन पर चर्चा शुरू हो गई है। अब हाई कोर्ट की समीक्षा प्रक्रिया ही इन 22 मौत की सज़ाओं के अंतिम परिणाम तय करेगी।
