मुंबई बेंच के ITAT ने एक अहम फैसला सुनाया है। अब नॉन-रेजिडेंट इंडियंस (NRIs) अपने Employee Stock Options (ESOPs) पर कैपिटल गेन्स टैक्स की गणना के लिए, शेयर खरीदने (Exercise) की तारीख के Fair Market Value (FMV) को ही लागत मान सकेंगे। इससे ESOPs पर डबल टैक्सेशन से राहत मिलेगी। हालांकि, टैक्स डिपार्टमेंट इस फैसले को आगे चुनौती दे सकता है।
NRIs के लिए ESOP टैक्स में मिली बड़ी राहत
मुंबई बेंच ऑफ इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) ने नॉन-रेजिडेंट इंडियंस (NRIs) को उनके Employee Stock Options (ESOPs) पर टैक्स के मामले में एक महत्वपूर्ण राहत दी है। यह फैसला राजेश आर. हेमराजानी बनाम इनकम टैक्स ऑफिसर (ITO) के मामले में आया है, जिसने ESOPs को बेचने पर कैपिटल गेन्स की गणना को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद को सुलझाया है।
डबल टैक्सेशन का झमेला
आमतौर पर, ESOPs पर टैक्स दो चरणों में लगता है। पहला, जब कर्मचारी शेयर खरीदने का ऑप्शन इस्तेमाल करता है, तो शेयर की असल कीमत (Exercise Price) और उस समय के बाजार मूल्य (Fair Market Value - FMV) के बीच का अंतर एक 'परक्विजिट' (Perquisite) माना जाता है और सैलरी इनकम पर टैक्स लगता है।
दूसरा, जब कर्मचारी इन शेयरों को बेचता है, तो मुनाफे पर कैपिटल गेन्स टैक्स लगता है। यह मुनाफा शेयर की बिक्री कीमत में से 'कॉस्ट ऑफ एक्वीजीशन' (Cost of Acquisition) घटाकर निकाला जाता है। यहाँ बड़ा सवाल यह था कि कॉस्ट ऑफ एक्वीजीशन, शेयर खरीदने की कम कीमत मानी जाए, या ऑप्शन इस्तेमाल करने की तारीख के FMV को। कम कीमत को कॉस्ट मानने पर कैपिटल गेन्स टैक्स बढ़ जाता था, जिससे एक ही एप्रिसिएशन पर दो बार टैक्स लगने की स्थिति बन जाती थी।
ITAT का फैसला
ITAT मुंबई बेंच ने साफ किया है कि इनकम-टैक्स एक्ट के सेक्शन 49(2AA) के तहत, शेयर खरीदने की तारीख का FMV ही कॉस्ट ऑफ एक्वीजीशन माना जाएगा। ट्रिब्यूनल ने टैक्स डिपार्टमेंट के इस तर्क को खारिज कर दिया कि यह नियम तभी लागू होता है जब ESOP का फायदा पहले भारत में टैक्सेबल हुआ हो। बेंच ने स्पष्ट किया कि सेक्शन 49(2AA) में ऐसी कोई शर्त नहीं है कि परक्विजिट पर भारत में टैक्स लगा हो, तभी इस लाभ के लिए अर्हता प्राप्त होगी। यह NRIs के लिए एक बड़ी जीत है, जिन्हें शायद भारत में परक्विजिट पर टैक्स नहीं लगा हो।
जोखिम और आगे की अनिश्चितता
हालांकि, यह फैसला NRIs के लिए एक सकारात्मक कदम है, लेकिन यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह अंतिम नहीं है। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दे सकता है। चूंकि टैक्स कानूनों की अलग-अलग अदालतों में अलग-अलग व्याख्याएं हो सकती हैं, इसलिए यह फैसला फिलहाल एक मजबूत मिसाल पेश करता है, लेकिन यह गारंटी नहीं है कि टैक्स डिपार्टमेंट भविष्य में ऐसे दावों पर सवाल उठाना बंद कर देगा।
जो टैक्सपेयर्स पिछले टैक्स रिटर्न में इस लाभ का दावा करने के लिए संशोधन (Amendment) करने पर विचार कर रहे हैं, उन्हें सावधानी बरतनी चाहिए। यह प्रक्रिया जटिल हो सकती है, खासकर उन सालों के लिए जहां रिवीजन की मानक समय-सीमा समाप्त हो चुकी है। विस्तृत डॉक्यूमेंटेशन रखना बहुत ज़रूरी है, जिसमें एक्सरसाइज की तारीख का FMV वैल्यूएशन रिपोर्ट, एक्सरसाइज की तारीख का प्रमाण, और सैलरी व कैपिटल गेन्स की गणना के स्पष्ट रिकॉर्ड शामिल हों। कोई भी कदम उठाने से पहले, निवेशकों को एक योग्य टैक्स सलाहकार से सलाह लेनी चाहिए ताकि यह समझ सकें कि यह फैसला उनकी विशेष निवास स्थिति (Residency Status) और किसी भी लागू टैक्स संधि (Tax Treaty) पर कैसे लागू होता है।
