मुंबई की एक स्पेशल CBI कोर्ट ने पुर्वी मोदी की वीडियो लिंक के जरिए गवाही देने की अर्जी खारिज कर दी है। वह पंजाब नेशनल बैंक (PNB) फ्रॉड केस में 'अप्रूवर' बनने की कोशिश कर रही थीं। कोर्ट ने साफ किया है कि बयान कोर्ट की तय प्रक्रिया के तहत ही दर्ज होगा।
मुंबई की एक स्पेशल CBI कोर्ट ने नीरव मोदी की बहन पुर्वी मोदी की वह याचिका खारिज कर दी है, जिसमें उन्होंने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए गवाही देने की इजाजत मांगी थी। यह अर्जी उनके उस प्रयास का हिस्सा थी, जिसके तहत वह हाई-प्रोफाइल पंजाब नेशनल बैंक (PNB) फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन में 'अप्रूवर' बनना चाहती हैं। 'अप्रूवर' वह आरोपी होता है जो दूसरों के खिलाफ सबूत देने के बदले कोर्ट से नरमी की उम्मीद रखता है।
स्पेशल CBI जज सुभाष कर्हाले ने पुर्वी मोदी की दलीलें सुनने के बाद याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने साफ निर्देश दिया है कि उनका बयान कोर्ट की तय कानूनी प्रक्रियाओं के अनुसार ही दर्ज किया जाएगा। हालांकि, यह ध्यान देने वाली बात है कि पुर्वी मोदी को प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने एक अलग, संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पहले ही 'अप्रूवर' का स्टेटस दे रखा है। लेकिन CBI कोर्ट ने इस मामले में अपनी प्रक्रिया को स्वतंत्र रूप से फॉलो करने पर जोर दिया है।
PNB फ्रॉड का यह मामला 2018 में सामने आया था। इसमें बैंक की ब्राडी हाउस ब्रांच से जारी किए गए धोखाधड़ी वाले लेटर्स ऑफ अंडरटेकिंग (LoUs) से जुड़े बड़े वित्तीय अनियमितताओं के आरोप शामिल हैं। इस पूरे फ्रॉड का अनुमानित आंकड़ा करीब ₹13,000 करोड़ यानी लगभग $2 बिलियन था। इस घोटाले ने भारतीय वित्तीय क्षेत्र में बैंकिंग रेगुलेशन और इंटरनल रिस्क मैनेजमेंट की प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।
कानूनी जानकारों और निवेशकों के लिए, यह फैसला चल रही कानूनी कार्यवाही की धीमी और जटिल प्रकृति को दर्शाता है। CBI और ED इस केस में सालों से लगे हुए हैं, जिसमें नीरव मोदी को यूनाइटेड किंगडम से भारत प्रत्यर्पित (Extradite) कराने के भी प्रयास शामिल हैं, जहाँ वह अभी हिरासत में है। गवाहों की कानूनी स्थिति और उनकी गवाही इन प्रक्रियाओं का एक अहम हिस्सा है, क्योंकि यह जांच एजेंसियों की केस बनाने, संपत्ति का पता लगाने और रिकवरी करने की क्षमता को सीधे प्रभावित करता है।
बाजार और कानूनी व्यवस्था के लिए मुख्य फोकस संपत्ति की रिकवरी और आपराधिक मुकदमों के निष्कर्ष पर बना हुआ है। निवेशक और जानकार इन अदालती सुनवाई की प्रगति पर नजर रखना जारी रखेंगे, क्योंकि ऐसे हाई-प्रोफाइल मामलों का समाधान भारत में बैंकिंग कंप्लायंस और गवर्नेंस स्टैंडर्ड्स पर रेगुलेटरी फोकस को प्रभावित कर सकता है। अगले कदम में संभवतः बयान दर्ज करने की समय-सीमा और इस विशेष मामले में 'अप्रूवर' बनने की उनकी अर्जी पर अंतिम निर्णय के लिए आगे की अदालती कार्यवाही शामिल होगी।
