केंद्र सरकार ने लोकसभा में माइंस और मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026 पेश किया है। इस बिल का मकसद राज्यों को अपने स्तर पर खनिज टैक्स लगाने से रोकना है। सरकार का यह कदम माइनिंग और सीमेंट इंडस्ट्री के लिए लागत कम करने की दिशा में अहम माना जा रहा है, खासकर तब जब हाल ही में राज्यों ने खनिज पर टैक्स बढ़ाए थे। निवेशकों को इस बिल पर संसद की मंजूरी और संभावित कानूनी चुनौतियों पर नजर रखनी चाहिए।
खनिज टैक्स पर केंद्र का शिकंजा
केंद्र सरकार ने 10 अगस्त 2026 को लोकसभा में माइंस और मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026 पेश किया। इस प्रस्तावित कानून के तहत एक नई धारा 9D जोड़ने का प्रस्ताव है। यह धारा साफ तौर पर राज्य सरकारों को खनिज अधिकार (mineral rights) और खनिज वाली जमीन पर किसी भी तरह का टैक्स, सेस या लेवी लगाने से रोकेगी, जब तक कि केंद्र सरकार इसकी विशेष अनुमति न दे दे।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की कोशिश
यह कदम खनिज टैक्स (mineral taxation) पर नियंत्रण फिर से हासिल करने का सीधा प्रयास है और यह जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले से एक बड़ा बदलाव है। 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को खनिज उत्पादन पर टैक्स लगाने का अधिकार दिया था। इसके बाद झारखंड और तमिलनाडु जैसे कई राज्यों ने आयरन ओर, कोयला और चूना पत्थर जैसे खनिजों पर नए सेस लागू कर दिए थे। सीमेंट, स्टील और पावर जैसी इंडस्ट्रीज के लिए ये राज्य-स्तरीय लेवी अक्सर लागत का अतिरिक्त बोझ बन जाती थीं, जिससे प्रोडक्शन मार्जिन प्रभावित होता था और टैक्स का माहौल अनिश्चित हो जाता था।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
अगर यह बिल पास हो जाता है, तो निवेशकों के लिए लागत में स्थिरता आने की संभावना है। यह बिल प्रभावी रूप से राज्यों की स्वतंत्र टैक्स संरचनाएं बनाने की क्षमता को खत्म कर देगा, जिसके बारे में कंपनियों का कहना था कि यह उनकी प्रतिस्पर्धा को नुकसान पहुंचा रहा है। बिल में कहा गया है कि इस कानून के लागू होने से पहले राज्यों द्वारा पहले से वसूले गए टैक्स वापस नहीं किए जाएंगे, लेकिन कोई भी बकाया या लादे गए कर अमान्य माने जाएंगे। इससे माइनिंग और मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को कुछ राहत मिलेगी, जो पेंडिंग राज्य टैक्स मांगों को लेकर अनिश्चितता का सामना कर रही थीं।
आगे की राह और चुनौतियां
हालांकि, इस बिल के कानून बनने का रास्ता आसान नहीं है और इसमें कई बाधाएं हैं। खनिज-समृद्ध राज्यों ने इस कदम का तुरंत विरोध किया है। उनका मानना है कि यह उनके वित्तीय स्वायत्तता (fiscal autonomy) और राजस्व-उत्पन्न करने की शक्तियों पर हमला है। कानूनी विश्लेषकों को संवैधानिक चुनौतियों की भी उम्मीद है, क्योंकि केंद्र सरकार एक विधायी कार्रवाई के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की कोशिश कर रही है। अगर राज्य इसे अदालत में ले जाते हैं, तो कानून को लंबे समय तक कानूनी देरी का सामना करना पड़ सकता है।
इसके अलावा, विधायी प्रक्रिया (legislative process) पर भी सवाल उठ सकते हैं। विपक्ष ने इस बिल को संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee) को भेजने की मांग की है। अगर सरकार इस पर सहमत होती है या राजनीतिक गतिरोध पैदा होता है, तो बिल के लागू होने में काफी देरी हो सकती है, जिससे फिलहाल टैक्स की मौजूदा अनिश्चितता बनी रहेगी।
निवेशकों को संसद में बिल की प्रगति पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि कोई भी संशोधन या देरी इस क्षेत्र के लिए अपेक्षित लाभ को बदल सकती है। इसके अलावा, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकारें इस संशोधन को अदालत में चुनौती देती हैं या नहीं, जो इस कर सुधार की दीर्घकालिक व्यवहार्यता (long-term viability) को निर्धारित करने में एक महत्वपूर्ण कारक होगा।
