टाटा ट्रस्ट्स के पूर्व ट्रस्टी Mehli Mistry ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के पास एक याचिका दायर की है। इसमें मांग की गई है कि Tata Sons के बोर्ड में ट्रस्ट द्वारा नॉमिनेट किए गए डायरेक्टर्स को मिलने वाला कमीशन व्यक्तिगत आय के बजाय ट्रस्ट को मिलना चाहिए।
टाटा ग्रुप के भीतर गवर्नेंस और ट्रस्टी की पात्रता को लेकर विवाद और गहरा गया है। पूर्व ट्रस्टी Mehli Mistry ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के समक्ष एक नई याचिका दायर कर बड़ा कानूनी दांव चला है। उनका कहना है कि जो डायरेक्टर्स सीधे ट्रस्ट के नॉमिनेशन पर Tata Sons के बोर्ड में शामिल होते हैं, उन्हें मिलने वाला कमीशन उनका निजी पैसा नहीं बल्कि ट्रस्ट की संपत्ति है।
फिड्यूशरी ड्यूटी और कमीशन पर सवाल
Mistry ने तर्क दिया है कि ट्रस्ट के प्रतिनिधि के तौर पर काम करने वाले व्यक्तियों को अपनी जवाबदेही निभानी चाहिए। उन्होंने वित्त वर्ष 2025 के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि चेयरमैन Noel Tata को मिले करीब ₹1.42 करोड़ के कमीशन जैसे भुगतान व्यक्तिगत तौर पर रखे गए हैं। Mistry के मुताबिक, ट्रस्टी की स्थिति से जुड़ा कोई भी वित्तीय लाभ सीधे चैरिटेबल ट्रस्ट को ही मिलना चाहिए।
गवर्नेंस पर बढ़ा दबाव
अक्टूबर 2025 में पद से हटाए जाने के बाद से ही Mistry ने वर्तमान नेतृत्व की वैधता और नियुक्ति प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए हैं। उनकी नवीनतम फाइलिंग में ट्रस्टी की पात्रता, नागरिकता और रेजिडेंसी संबंधी नियमों को लेकर भी गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं। इन दावों से टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी Tata Sons के भविष्य और ट्रस्ट के प्रशासनिक ढांचे पर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं।
रेगुलेटरी एक्शन की तैयारी
अब यह मामला औपचारिक तौर पर महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर की निगरानी में है। नियामक ने Tata Trusts को अपना जवाब दाखिल करने के लिए 3 दिसंबर, 2026 की समय सीमा तय की है। यदि यह फैसला Mistry के पक्ष में आता है, तो बड़े चैरिटेबल संस्थानों में डायरेक्टर्स के मुआवजे और गवर्नेंस के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
