केंद्रीय कानून और न्याय मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर Mediation Council of India (MCI) की स्थापना कर दी है। इस कदम का मकसद विवादों को सुलझाने की प्रक्रिया को प्रोफेशनल बनाना है, जिससे अदालतों में पेंडिंग मामलों की संख्या कम होगी और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को बढ़ावा मिलेगा।
भारत सरकार के कानून और न्याय मंत्रालय ने 27 अगस्त, 2026 को Mediation Council of India (MCI) के गठन की आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है। Mediation Act, 2023 के तहत बनाई गई यह एक वैधानिक संस्था है, जो देश में सिविल और कमर्शियल विवादों को सुलझाने के तरीके को पूरी तरह से बदलने वाली है। मौजूदा स्थिति यह है कि देश की जिला अदालतों में 3 करोड़ 20 लाख से ज्यादा मामले पेंडिंग हैं, जो अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी रुकावट बने हुए हैं।
अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
निवेशकों और कंपनियों के लिए यह खबर काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीधे 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' से जुड़ी है। भारत में कॉन्ट्रैक्ट लागू करने (Contract Enforcement) में लगने वाला समय हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। जब कमर्शियल विवाद अदालतों में बरसों तक लटके रहते हैं, तो कंपनियों की वर्किंग कैपिटल फंस जाती है और ग्रोथ धीमी हो जाती है। एक स्टैंडरडाइज्ड मेडिएशन सिस्टम से अब विवादों को कोर्ट के बाहर तेजी से सुलझाना संभव हो पाएगा।
कैसे बदलेगा काम करने का तरीका?
अब तक भारत में मेडिएशन की प्रक्रिया काफी हद तक असंगठित (Ad-hoc) थी, जिससे समझौते को लागू करना मुश्किल होता था। MCI अब इसके लिए एक समान मानक तय करेगा, सर्विस प्रोवाइडर्स को मान्यता देगा और सर्टिफाइड प्रोफेशनल्स की एक टीम तैयार करेगा। इससे फायदा यह होगा कि आपसी सहमति से निकला समाधान पूरी तरह से कानूनी रूप से बाध्यकारी (Binding) होगा और बार-बार अपीलों के जरिए मामला फिर से कोर्ट नहीं पहुंचेगा।
अब आगे क्या?
भले ही यह एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव है, लेकिन निवेशकों को यह समझना होगा कि अभी यह काउंसिल केवल कागजों पर अस्तित्व में आई है। इसकी असल कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार इसका चेयरपर्सन और अन्य सदस्य किसे बनाती है। जब तक नेतृत्व की नियुक्ति और स्पष्ट नियम (Operational Rules) लागू नहीं हो जाते, तब तक यह एक लंबी अवधि की प्रक्रिया बनी रहेगी। बाजार की नजर अब इस बात पर है कि काउंसिल की लीडरशिप टीम की घोषणा कब होती है।
