केंद्र सरकार ने 'Mediation Council of India' का औपचारिक गठन कर दिया है। इस कदम का मकसद कमर्शियल और सिविल विवादों को तेजी से सुलझाना है, जिससे कंपनियों के कानूनी खर्च और समय में बड़ी बचत हो सकेगी।
विवाद समाधान का नया दौर
केंद्र सरकार ने 27 अगस्त 2026 को Mediation Act, 2023 के तहत 'Mediation Council of India' को अधिसूचित कर दिया है। दिल्ली में स्थित यह संस्था अब देश भर में मेडिएशन (mediation) प्रक्रिया को रेग्युलेट करेगी, मेडिएटर्स को सर्टिफाई करेगी और सर्विस प्रोवाइडर्स को मान्यता देगी।
कॉरपोरेट सेक्टर को क्या फायदा?
भारतीय कंपनियों के लिए यह एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। फिलहाल अदालतों में लंबित मामलों के कारण कंपनियों को सालों-साल कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है, जो बेहद महंगी साबित होती है। अब एक संस्थागत (institutionalized) सिस्टम बनने से विवादों को कोर्ट के बाहर और कम समय में सुलझाना आसान होगा। इसके फैसले कानूनी रूप से बाध्यकारी (binding) होंगे।
चुनौतियां और जोखिम
हालांकि यह एक बड़ा सुधार है, लेकिन इसके सामने कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस नई बॉडी के पास पर्याप्त रिसोर्स (resource) और सक्षम लीडरशिप का होना बड़ी चुनौती होगी। इसके अलावा, जहां सरकार खुद किसी विवाद का पक्षकार हो, वहां इस काउंसिल की स्वतंत्रता (independence) पर सवाल उठना तय है।
इंटरनेशनल विवादों का पेंच
इसके अलावा, मेडिएशन को अनिवार्य बनाने की प्रक्रिया पर भी बहस छिड़ी है। जानकारों का कहना है कि यह 'प्री-लिटिगेशन' (pre-litigation) मेडिएशन कभी-कभी प्रक्रिया को सरल बनाने के बजाय और लंबा खींच सकता है। साथ ही, मेडिएशन एक्ट 2023 में भारत के बाहर होने वाली अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के समझौतों को लागू करने को लेकर नियम अभी भी स्पष्ट नहीं हैं, जो क्रॉस-बॉर्डर काम करने वाली कंपनियों के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
अब सबकी नजरें काउंसिल के कामकाज के नियमों और नियुक्ति (appointments) पर टिकी हैं, जो तय करेंगी कि यह संस्था वास्तव में अदालती बोझ को कम करने में कितनी सफल होती है।
