महाराष्ट्र में फूड सेफ्टी को लेकर FDA का 'रेड' वाला रवैया अब सवालों के घेरे में है। पूर्व FDA कमिश्नर महेश ज़ागड़े ने राज्य सरकार के इस तरीके पर चिंता जताई है और इसे बिजनेस के लिए अनिश्चितता बढ़ाने वाला बताया है। कमिश्नर तुकाराम मुंडे के नेतृत्व में चल रही इस मुहिम से कई रेस्टोरेंट और क्विक-कॉमर्स कंपनियों के कामकाज पर असर पड़ा है।
'रेड' से डर नहीं, सुधार चाहिए: ज़ागड़े
महाराष्ट्र में खाने-पीने की चीजों की सुरक्षा को लेकर चल रही कार्रवाईयों पर पूर्व FDA कमिश्नर महेश ज़ागड़े ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है कि 'सेफ फूड, सेफ महाराष्ट्र' कैम्पेन के तहत हो रही ताबड़तोड़ रेड और लाइसेंस तुरंत सस्पेंड करने की कार्रवाई से कारोबारियों में खौफ का माहौल बन रहा है। ज़ागड़े, जो 2011 से 2014 तक राज्य FDA के प्रमुख थे, का मानना है कि 2006 के फूड सेफ्टी एक्ट का मकसद डराना नहीं, बल्कि खाने के स्टैंडर्ड्स को सुधारना है। उनका कहना है कि मौजूदा तरीका, जो कमिश्नर तुकाराम मुंडे की अगुवाई में चल रहा है, व्यवसायों को बाधित कर सकता है और जरूरत से ज्यादा सख्ती की ओर ले जा सकता है।
क्विक-कॉमर्स और रिटेल पर क्या होगा असर?
FDA की ये कार्रवाई सिर्फ रेस्टोरेंट तक ही सीमित नहीं है, बल्कि क्विक-कॉमर्स कंपनियों के वेयरहाउस और फुलफिलमेंट सेंटर्स तक भी पहुंच गई है। Blinkit, Zepto और Instamart जैसी कंपनियों के सेंटर्स पर भी हाल में जांच हुई है। निवेशकों के लिए यह एक बड़ा रेगुलेटरी रिस्क है। जब कोई फैसिलिटी लाइसेंस सस्पेंशन या सीज होने का सामना करती है, तो सीधे तौर पर इन कंपनियों की ऑपरेशनल क्षमता और कमाई पर असर पड़ता है।
आम रिटेल की तुलना में, जहां एक दुकान बंद होने का असर लोकल होता है, वहीं एक सेंट्रल वेयरहाउस या डार्क स्टोर के बंद होने से पूरा डिलीवरी नेटवर्क प्रभावित हो सकता है। ये कंपनियां कम मार्जिन और हाई-वॉल्यूम पर काम करती हैं। स्वच्छता संबंधी समस्याओं के कारण अचानक बंद होने से इन्वेंटरी लॉस और डिलीवरी में देरी हो सकती है, जिससे कंपनियों को तुरंत कंप्लायंस गैप को पूरा करने के लिए संसाधन जुटाने पड़ते हैं।
सजा या 'ग्रेडेड' तरीका?
असली बहस Enforcement के तरीके पर है। ज़ागड़े एक 'ग्रेडेड' यानी चरणबद्ध तरीके की वकालत करते हैं। इस मॉडल में, अगर कोई कंपनी नियमों का पालन नहीं करती है, तो पहले उसे सुधार नोटिस जारी किया जाएगा। अगर कंपनी तय समय में सुधार नहीं करती है, तभी लाइसेंस सस्पेंशन जैसी कार्रवाई होगी। उनका तर्क है कि मौजूदा रेड-हेवी सिस्टम, जो पुराने 1954 के प्रिवेंशन ऑफ फूड एडल्टरेशन एक्ट की याद दिलाता है, व्यवसायों की साख को नुकसान पहुंचा सकता है और जरूरी नहीं कि इससे फूड हाइजीन में लंबे समय तक सुधार हो।
फिलहाल महाराष्ट्र का रेगुलेटरी माहौल पब्लिक हेल्थ की प्राथमिकताओं और बिजनेस की निरंतरता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। यह बहस इस ओर इशारा करती है कि फूड और क्विक-कॉमर्स सेक्टर की कंपनियों को अचानक ऑपरेशनल रुकावटों के जोखिम को कम करने के लिए कंप्लायंस मैनेजमेंट पर ज्यादा ध्यान देना होगा। निवेशक इस बात पर नजर रखेंगे कि राज्य सरकार सुझाए गए चरणबद्ध तरीके की ओर बढ़ती है या मौजूदा आक्रामक रुख बनाए रखती है, क्योंकि यह राज्य में इस सेक्टर के लिए कंप्लायंस लागत और ऑपरेशनल जोखिम प्रोफाइल को प्रभावित करेगा।
