मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक 3 साल की बच्ची के स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) के इलाज के लिए **₹1 करोड़** की फंड की कमी को पूरा करने का निर्देश दिया है। इस इलाज का कुल खर्च **₹9.55 करोड़** है। यह मामला भारत में दुर्लभ बीमारियों के महंगे इलाज के लिए फंडिंग की नीतियों की चुनौतियों को उजागर करता है।
एक नन्हीं जान की लड़ाई: ₹9.55 करोड़ के इलाज पर हाई कोर्ट की नजर
इंदौर में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट एक 3 साल के बच्चे से जुड़े एक गंभीर मामले की सुनवाई कर रहा है, जिसे स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) टाइप-2 का निदान हुआ है। इस जानलेवा बीमारी के इलाज के लिए लगभग ₹9.55 करोड़ की भारी भरकम राशि की जरूरत है। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को समझते हुए अधिकारियों को निर्देश दिया है कि बच्चे को जल्द से जल्द इलाज मिले और इसमें कोई देरी न हो।
फंड की कमी: ₹1 करोड़ का अंतर कैसे भरेगा?
जनता और सरकार के संयुक्त प्रयासों के बावजूद, इलाज के लिए पैसों की कमी बनी हुई है। कोर्ट में पेश किए गए दस्तावेजों के अनुसार, अब तक पब्लिक क्राउडफंडिंग और चैरिटी से करीब ₹8 करोड़ जुटाए जा चुके हैं। इसके अलावा, सेंट्रल गवर्नमेंट 'नेशनल पॉलिसी फॉर रेयर डिजीजेस' (NPRD) के तहत प्रति मरीज ₹50 लाख तक की वित्तीय सहायता प्रदान करती है। इन सब के बावजूद, लगभग ₹1 करोड़ की कमी बाकी है। कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से इस अंतर को पाटने के विकल्पों पर विचार करने का आग्रह किया है, क्योंकि यह मामला असाधारण है।
हेल्थकेयर निवेशकों के लिए पॉलिसी का महत्व
यह मामला भारत में दुर्लभ बीमारियों से निपटने के मौजूदा ढांचे की जटिलताओं को दर्शाता है। NPRD का उद्देश्य इन बीमारियों के इलाज के लिए एक व्यवस्थित फंडिंग व्यवस्था प्रदान करना है। हालांकि, ग्लोबल फार्मा कंपनियों द्वारा बनाए जाने वाले महंगे इलाज, जैसे कि Novartis की दवाएं, मौजूदा वित्तीय व्यवस्थाओं पर भारी पड़ रहे हैं। हेल्थकेयर और फार्मा सेक्टर के लिए, ऐसे मामलों का बार-बार सामने आना और अदालती हस्तक्षेप यह संकेत देता है कि बेहद दुर्लभ बीमारियों के लिए फंडिंग के मॉडल अभी भी विकसित हो रहे हैं।
निवेशक इस क्षेत्र में होने वाले विकास पर कड़ी नजर रखते हैं, क्योंकि यह सरकारी खर्च और सहायता योजनाओं की स्पष्टता को दर्शाता है। हेल्थकेयर फंडिंग में लगातार अदालती हस्तक्षेप यह बता सकता है कि मौजूदा पॉलिसी और इलाज की वास्तविक लागत के बीच एक अंतर है। यह विशेष और महंगी दवाओं के वितरण और निर्माण से जुड़ी कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक बना हुआ है।
प्रशासनिक देरी और क्राउडफंडिंग पर निर्भरता जैसी व्यवस्थागत समस्याएं मरीजों और हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स दोनों के लिए अनिश्चितता पैदा कर सकती हैं। जैसे-जैसे सरकार NPRD के प्रति अपने दृष्टिकोण को परिष्कृत कर रही है, वित्तीय बाधाओं और रोगी देखभाल की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाना हेल्थकेयर सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण बिंदु बना रहेगा।
हाई कोर्ट ने निर्देश दिया है कि संबंधित दस्तावेज आगे की प्रक्रिया के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली को सौंपे जाएं। इस मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त, 2026 को होगी, जिसमें फंड की कमी को पूरा करने की प्रगति की समीक्षा की जाएगी।
