भारत में काम कर रहे Global Capability Centres (GCCs) की राह में सरकारी नियम-कानून बड़ी बाधा बने हुए हैं। इसे देखते हुए अब दिग्गज भारतीय लॉ फर्मों ने कंपनियों को कानूनी मदद देने के लिए विशेष टीमें बनाई हैं, ताकि **$98.4 बिलियन** के इस उभरते मार्केट में कारोबार शुरू करना आसान हो सके।
भारत के GCC हब बनने के सफर में नौकरशाही की जटिलताएं एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी हैं। वर्तमान में देश में 2,100 से ज्यादा सेंटर्स सक्रिय हैं, जिनमें 23.6 लाख प्रोफेशनल्स काम कर रहे हैं। हालांकि, मल्टीनेशनल कंपनियां अक्सर ऑपरेशन शुरू करने में आने वाली अड़चनों से परेशान रहती हैं।\n\n### बढ़ती मांग और चुनौती\nवित्त वर्ष 2026 तक GCC मार्केट का साइज $98.4 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। इस बढ़ते पोटेंशियल को देखते हुए Cyril Amarchand Mangaldas और Trilegal जैसी बड़ी लॉ फर्में अब फ्रंट-फुट पर हैं। सिंगल-विंडो सिस्टम के दावों के बावजूद, जमीनी हकीकत यह है कि रजिस्ट्रेशन के बाद कामकाज शुरू करने और पहला इनवॉइस जनरेट करने में कंपनियों को 2 महीने तक का समय लग जाता है।\n\n### टैक्स और कंप्लायंस का जाल\nदिक्कत सिर्फ कागजी काम तक सीमित नहीं है। GCCs अब केवल बैक-ऑफिस का काम नहीं कर रहे, बल्कि स्ट्रैटेजिक रोल निभा रहे हैं। ऐसे में GST फाइलिंग, लेबर लॉ और पेरोल इंटीग्रेशन जैसे काम सिरदर्द बन रहे हैं। सबसे पेचीदा मुद्दा 'एम्प्लॉई सेकेंडमेंट' (Employee Secondment) का है। अगर नियम ठीक से न बनाए जाएं, तो विदेशी पैरेंट कंपनी पर टैक्स लायबिलिटी और ट्रांसफर प्राइसिंग ऑडिट का खतरा मंडराने लगता है।\n\n### निवेशकों के लिए संकेत\nनिवेशकों की नजर में GCC सेक्टर भारत की ग्लोबल इकोनॉमी में बढ़ती हिस्सेदारी का पैमाना है। लेकिन जब किसी कंपनी को अपना कीमती समय प्रशासनिक बाधाओं को सुलझाने में बिताना पड़ता है, तो उसकी स्केलेबिलिटी पर बुरा असर पड़ता है। अब देखना यह है कि सरकारी सिस्टम इन रुकावटों को कितना जल्दी दूर कर पाता है, क्योंकि यही भविष्य में इस सेक्टर की ग्रोथ तय करेगा।
