CBI की याचिका पर केजरीवाल-मनीष सिसोदिया की मांग: खारिज हो केस!

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AuthorNeha Patil|Published at:
CBI की याचिका पर केजरीवाल-मनीष सिसोदिया की मांग: खारिज हो केस!

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने शराब नीति केस में CBI की याचिका को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है। दोनों नेताओं ने दलील दी है कि जांच एजेंसी ने डिस्चार्ज ऑर्डर के खिलाफ जल्दबाजी में अर्जी दाखिल की है। मामले की सुनवाई 17 और 18 अगस्त को होनी है।

CBI के खिलाफ केजरीवाल और सिसोदिया की दलीलें

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने शराब नीति से जुड़े मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की दायर रिवीजन पिटीशन (Revision Petition) को खारिज करने की मांग करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है। CBI, ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दे रही है जिसमें 27 फरवरी 2026 को पूर्व मुख्यमंत्री, उनके डिप्टी समेत 21 अन्य लोगों को इस हाई-प्रोफाइल केस से डिस्चार्ज (Discharge) कर दिया गया था।

'CBI ने की जल्दबाजी'

दोनों नेताओं के वकीलों ने हाईकोर्ट में दलील दी है कि CBI ने ट्रायल कोर्ट के डिस्चार्ज जजमेंट के महज 4 घंटे के भीतर अपनी याचिका दायर कर दी थी। बचाव पक्ष ने इस कार्रवाई को "अभूतपूर्व जल्दबाजी" और "गंभीरता की कमी" वाला बताया। अर्जी के मुताबिक, CBI की पिटीशन में खास ग्राउंड्स (Grounds) का अभाव है और इसने 549 पन्नों के डिस्चार्ज ऑर्डर में दिए गए निष्कर्षों पर ध्यान नहीं दिया है। इसी वजह से यह एक "बेयर-शेल" (Bare-shell) पिटीशन बन गई है, जिससे यह समझना मुश्किल है कि एजेंसी की आपत्तियां क्या हैं।

कानूनी दांव-पेच और बाजार पर असर

राजनीतिक दिग्गजों से जुड़े लंबे कानूनी मामले अक्सर प्रशासनिक अनिश्चितता का माहौल बना सकते हैं। ऐसे में दिल्ली में कारोबार करने वाले निवेशक और व्यवसाय, नीतिगत माहौल की दीर्घकालिक स्थिरता पर पड़ने वाले प्रभाव पर नज़र रखते हैं।

CBI का क्या है कहना?

CBI का कहना है कि ट्रायल कोर्ट का डिस्चार्ज ऑर्डर "स्पष्ट रूप से अवैध" था और निचली अदालत ने एविडेंस (Evidence) की समीक्षा के बजाय "मिनी-ट्रायल" (Mini-trial) किया। एजेंसी का यह भी तर्क है कि निचली अदालत ने अभियोजन पक्ष के मामले को चुनिंदा तरीके से पढ़ा और जांच एजेंसी के खिलाफ अनुचित टिप्पणियां कीं, जिसके चलते ऑर्डर पर रिवीजन (Revision) की आवश्यकता है।

बचाव पक्ष का पक्ष

वहीं, बचाव पक्ष के वकील तर्क दे रहे हैं कि हाईकोर्ट की रिवीजनल पावर सीमित है और इसका इस्तेमाल केवल गंभीर त्रुटियों या कानूनी खामियों के मामलों में ही किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि CBI रिवीजन प्रक्रिया का इस्तेमाल सबूतों की फिर से जांच के लिए कर रही है, जो मौजूदा कानूनी ढांचे में अनुमत नहीं है।

आगे क्या?

जस्टिस मनोज जैन की अध्यक्षता वाली दिल्ली हाईकोर्ट की बेंच इस मामले पर 17 और 18 अगस्त 2026 को सुनवाई करेगी। इन सुनवाईयों के नतीजे यह तय करेंगे कि ट्रायल कोर्ट का डिस्चार्ज ऑर्डर बना रहेगा या नेताओं के खिलाफ केस में आगे न्यायिक जांच होगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.