Karnataka High Court ने साल 2022 के उस कानून को असंवैधानिक करार दिया है, जिसके जरिए SC और ST आरक्षण का दायरा बढ़ाया गया था। कोर्ट के इस आदेश से राज्य में आरक्षण का कुल आंकड़ा **56%** से घटकर वापस पुरानी स्थिति पर आ गया है, जिससे सरकारी भर्तियों और एडमिशन पर बड़ा असर पड़ेगा।
कोर्ट का तार्किक आधार
चीफ जस्टिस विभु बाखरू और जस्टिस के.एस. हेमलेखा की बेंच ने अपने फैसले में साफ किया कि साल 1992 के 'इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई 50% की अधिकतम सीमा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार ने 2022 में SC आरक्षण को 15% से बढ़ाकर 17% और ST आरक्षण को 3% से बढ़ाकर 7% कर दिया था, जिससे कुल कोटा 56% हो गया था, जिसे अब कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के खिलाफ माना है।
भर्ती और शिक्षा पर असर
इस फैसले के बाद राज्य सरकार की भर्तियों और शैक्षणिक संस्थानों में एडमिशन की प्रक्रिया में अफरा-तफरी मच सकती है। जिन विभागों ने नए नियमों के आधार पर प्रक्रिया शुरू की थी, उन्हें अब पुराने ढांचे पर वापस लौटना पड़ सकता है। इससे नियुक्तियों में देरी की आशंका बढ़ गई है।
सरकार की आगे की रणनीति
डिप्टी सीएम जी. परमेश्वर ने संकेत दिए हैं कि सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने पर विचार कर रही है। साथ ही, राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा है कि राज्य सरकार केंद्र से इस कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची (Ninth Schedule) में शामिल कराने की मांग कर सकती है, ताकि इसे न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) से सुरक्षा मिल सके। निवेशकों और सरकारी पॉलिसी पर नजर रखने वाले स्टेकहोल्डर्स के लिए यह एक संवेदनशील स्थिति है क्योंकि आने वाले समय में प्रशासनिक कामकाज और पॉलिसी इंप्लीमेंटेशन में अस्थिरता बनी रह सकती है।
