कर्नाटक विधान परिषद के सभापति बसवराज होरट्टी का इंकार, बोले- 'हटाने के लिए नियम का पालन हो'

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AuthorMehul Desai|Published at:
कर्नाटक विधान परिषद के सभापति बसवराज होरट्टी का इंकार, बोले- 'हटाने के लिए नियम का पालन हो'

कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के अनुरोध के बावजूद, विधान परिषद के सभापति बसवराज होरट्टी ने पद से हटने से साफ इनकार कर दिया है। होरट्टी का कहना है कि एक संवैधानिक पद होने के नाते, उन्हें हटाने के लिए पार्टी के निर्देशों के बजाय औपचारिक प्रक्रिया, जैसे अविश्वास प्रस्ताव, का पालन करना होगा। यह राजनीतिक घटनाक्रम राज्य सरकार के लिए महत्वपूर्ण है, जो सदन के शीर्ष पदों पर अपने उम्मीदवारों को नामित करना चाहती है।

कर्नाटक विधान परिषद के सभापति बसवराज होरट्टी ने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के पद छोड़ने के अनुरोध को सार्वजनिक रूप से ठुकरा दिया है। यह इनकार कांग्रेस पार्टी द्वारा सदन में अपने नेताओं को नियुक्त करने के प्रयास के बीच आया है। आठ बार के अनुभवी सदस्य होरट्टी ने जोर देकर कहा कि सभापति का पद स्वतंत्र होना चाहिए और इसे पार्टी नेतृत्व के फैसलों के अधीन राजनीतिक नियुक्ति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया

होरट्टी ने स्पष्ट किया कि उनका पद संवैधानिक और संसदीय नियमों से सुरक्षित है। उन्होंने समझाया कि सभापति को हटाना केवल इस्तीफे के अनुरोध का मामला नहीं है, बल्कि इसके लिए एक औपचारिक कानूनी प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। मौजूदा विधायी ढांचे के अनुसार, इसके लिए सदन के कम से कम दस सदस्यों द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाया जाना चाहिए, साथ ही 14 दिन का नोटिस देना होगा। अंतिम निर्णय पार्टी आलाकमान द्वारा तय नहीं किया जाएगा, बल्कि यह परिषद के सदस्यों के हाथ में होगा।

सदन की वर्तमान स्थिति और राजनीतिक समीकरण

यह घटनाक्रम राज्य की विधायी स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। कर्नाटक विधान परिषद में वर्तमान में 75 सदस्य हैं। कांग्रेस पार्टी 38 सीटों के साथ बहुमत में है, जबकि भाजपा के पास 24 और जद(एस) के पास 6 सीटें हैं। सरकार द्वारा सभापति के पद को अपने खेमे में लाने का प्रयास आगामी सत्रों में विधेयकों को आसानी से पारित कराने और अपनी विधायी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने की मंशा से देखा जा रहा है।

शासन पर संभावित प्रभाव

राज्य के राजनीतिक और नीतिगत परिदृश्य पर नज़र रखने वालों के लिए, मुख्य चिंता यह है कि क्या यह गतिरोध आगामी विधायी कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करेगा। कार्यपालिका और परिषद के पीठासीन अधिकारी के बीच गतिरोध विधायी एजेंडे को धीमा कर सकता है, जिससे सरकारी नीतियों या बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के समय पर असर पड़ सकता है जिन्हें विधायी मंजूरी की आवश्यकता होती है। यह देखना होगा कि क्या सरकार औपचारिक अविश्वास प्रस्ताव के साथ आगे बढ़ती है या यह स्थिति सदन के भीतर राजनीतिक अनिश्चितता की ओर ले जाती है। अगला महत्वपूर्ण घटनाक्रम मानसून सत्र की शुरुआत के साथ पता चलेगा, जो 13 अगस्त, 2026 को शुरू होने वाला है। इससे यह स्पष्ट होगा कि विधायी निकाय सामान्य रूप से काम करता रहेगा या प्रक्रियात्मक बाधाओं का सामना करेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.