मुजफ्फरनगर के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज रवि कुमार दिवाकर ने महज पांच महीनों में **23वीं** बार मौत की सजा सुनाई है। इस दौरान उन्होंने आपराधिक तत्वों से मिल रही धमकियों और अपने कोर्ट से **100** गंभीर केस हटाए जाने का बड़ा दावा किया है।
मुजफ्फरनगर की फास्ट-ट्रैक कोर्ट में तैनात एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज रवि कुमार दिवाकर ने हाल ही में दहेज से जुड़ी हत्या के एक मामले में अपना फैसला सुनाया। यह पिछले 5 महीनों में उनका 23वां डेथ सेंटेंस है। अपने आदेश में जज ने स्पष्ट रूप से उन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का जिक्र किया है जिनमें वे काम कर रहे हैं। उन्होंने साफ कहा कि वे 'कायर जज' कहलाने के बजाय मौत को चुनना बेहतर समझेंगे।
धमकियों का साया और केस ट्रांसफर का विवाद
जज ने दावा किया कि उन्हें लगातार आपराधिक तत्वों से धमकियां मिल रही हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि वे दबाव में झुकते हैं, तो न्यायपालिका पर जनता का भरोसा डगमगा जाएगा। हैरानी की बात यह है कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के मुकर जाने के बावजूद, कोर्ट ने दिल्ली के अस्पताल में रिकॉर्ड किए गए पीड़िता के 'डाइंग डिक्लेरेशन' के आधार पर यह कड़ा फैसला सुनाया।
इसके अलावा, प्रशासनिक स्तर पर हुए बदलाव भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। जज दिवाकर ने आरोप लगाया है कि अगस्त 2026 में उनके कोर्ट से हत्या और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े लगभग 100 केस दूसरे जज के पास ट्रांसफर कर दिए गए थे, जिससे केस की निरंतरता और न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।
अतीत में रहे हैं विवादों में
जज रवि कुमार दिवाकर पहले भी हाई-प्रोफाइल मामलों के चलते सुर्खियों में रहे हैं। साल 2022 में उन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के वीडियोग्राफिक सर्वे का आदेश दिया था, जिसके बाद उन्हें धमकियां मिली थीं। वहीं, मार्च 2024 में दंगे से जुड़े एक मामले में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को 'फिलॉसफर किंग' बताने वाली उनकी टिप्पणी को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड से हटा दिया था।
अब कानून के जानकार इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि मुजफ्फरनगर कोर्ट में हो रहे ये प्रशासनिक बदलाव और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भविष्य के अन्य बड़े आपराधिक मामलों की सुनवाई को कैसे प्रभावित करेंगे।
