भारतीय जेलों का संकट: **3.68 लाख** से अधिक कैदी ट्रायल का कर रहे हैं इंतजार

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AuthorNeha Patil|Published at:
भारतीय जेलों का संकट: **3.68 लाख** से अधिक कैदी ट्रायल का कर रहे हैं इंतजार

देश की जेलों में बंद कैदियों में से लगभग **73%** यानी **3.68 लाख** लोग अभी भी विचाराधीन (Undertrial) हैं। कुल **5.09 लाख** कैदियों वाली आबादी के बीच यह आंकड़ा न्यायिक प्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।

प्रणाली में बड़ी खामियां

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 2024 के अंत तक 1,331 जेलों में बंद कैदियों में से 368,883 लोग ऐसे हैं जिनका केस अभी कोर्ट में चल रहा है। इनमें से अधिकांश लोग आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं, जो कानूनी लड़ाई लड़ने में अक्षम हैं।

BNSS और जमीनी हकीकत

जेलों की भीड़ कम करने के लिए सरकार ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 479 पेश की थी, जिसका मकसद लंबे समय से जेल में बंद विचाराधीन कैदियों को पर्सनल बॉन्ड पर रिहा करना था। हालांकि, जमीनी स्तर पर इसका पालन बेहद धीमा है। जेल प्रशासन द्वारा अदालतों में समय पर पहल न किए जाने के कारण, कानूनी प्रावधान होने के बावजूद हजारों कैदी वर्षों से जेलों में बंद हैं।

आर्थिक बोझ और प्रशासनिक बाधाएं

इतनी बड़ी संख्या में कैदियों को रखने का सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ रहा है। जेलों का खर्च कैदियों की संख्या पर निर्भर करता है, जो राज्य के संसाधनों पर एक बड़ा आर्थिक बोझ बन गया है। इसके अलावा, करीब 60% विचाराधीन कैदी साक्षरता की कमी के कारण कानूनी प्रक्रियाओं को समझने में संघर्ष करते हैं।

फिलहाल, किसी भी सेंट्रल ऑडिट सिस्टम की कमी के चलते व्यक्तिगत केस की ट्रैकिंग करना मुश्किल है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट्स को सख्त निर्देश दिए हैं, लेकिन समयबद्ध केस-ट्रैकिंग सिस्टम न होने की वजह से सुधार की गति सुस्त बनी हुई है। आने वाले समय में डिजिटाइजेशन और प्रशासन की सक्रियता ही इस संकट को हल करने में निर्णायक साबित होगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.