देश में अदालती मामलों के भारी बोझ को कम करने के लिए Mediation Council of India (MCI) अब पूरी तरह काम करने लगा है। यह कदम बिजनेस जगत के लिए गेम-चेंजर हो सकता है, क्योंकि इसका लक्ष्य कोर्ट के बाहर विवाद सुलझाकर कॉन्ट्रैक्ट एनफोर्समेंट को आसान बनाना है।
नई दिल्ली में Mediation Council of India (MCI) का संचालन शुरू हो गया है, जो 'Mediation Act of 2023' के तहत एक बड़ा कदम है। इसका मुख्य उद्देश्य कोर्ट के पारंपरिक चक्करों से हटकर विवादों को सुलझाने के लिए एक व्यवस्थित ढांचा तैयार करना है। देश में लगभग 3.5 करोड़ मामले कोर्ट में पेंडिंग हैं, जो पूरी न्यायिक व्यवस्था पर भारी दबाव बनाए हुए हैं।
बिजनेस और लीगल कॉस्ट पर असर
कॉर्पोरेट जगत के लिए कानूनी विवाद किसी बड़े बोझ से कम नहीं होते। लंबे कोर्ट केस से न केवल कंपनी का वर्किंग कैपिटल फंसता है, बल्कि बिजनेस की ग्रोथ भी प्रभावित होती है। सरकार अब इस प्रक्रिया को फॉर्मल बनाकर कमर्शियल विवादों के लिए एक तेज और स्ट्रक्चर्ड रास्ता बनाना चाहती है। इससे भारत की 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' रैंकिंग में सुधार होने की संभावना है, क्योंकि कंपनियां सालों तक अपील के इंतजार के बजाय जल्दी सेटलमेंट कर सकेंगी।
एडॉप्शन की बड़ी चुनौती
हालांकि, नई काउंसिल के सामने सबसे बड़ी चुनौती मौजूदा नियमों को अपनाने की है। 'Commercial Courts Act' के तहत सेक्शन 12A में पहले से ही बिजनेस विवादों के लिए प्री-लिटिगेशन मेडिएशन अनिवार्य है, लेकिन नतीजे अब तक बेहद निराशाजनक रहे हैं। फाइनेंशियल ईयर 2026 की पहली छमाही के आंकड़ों के अनुसार, इन अनिवार्य मेडिएशन सेशन की सफलता दर महज 1.3% रही है। यह आंकड़ा बताता है कि अब तक पार्टियां कोर्ट के बाहर समझौता करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रही थीं।
निवेशकों के लिए क्या है अहम?
काउंसिल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कितने कुशल मेडिएटर्स की फौज तैयार करती है और नियमों को कितना मानकीकृत (standardize) करती है। इन्वेस्टर्स और कॉर्पोरेट लीगल टीमों को अब एक्रेडिटेशन प्रोसेस पर नजर रखनी चाहिए। यदि MCI विवादों को निपटाने का कल्चर बदलने में सफल रही, तो कंपनियों का कानूनी खर्च और समय दोनों में भारी कमी आएगी, जिससे ऑपरेशनल एफिशिएंसी में सुधार होगा।
