DPDP Act पर सुप्रीम कोर्ट का पहरा: पारदर्शिता पर खड़ा सवाल, डेटा नियमों पर मंडराया खतरा

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AuthorNeha Patil|Published at:
DPDP Act पर सुप्रीम कोर्ट का पहरा: पारदर्शिता पर खड़ा सवाल, डेटा नियमों पर मंडराया खतरा

भारत का डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023, अब सुप्रीम कोर्ट की जांच के दायरे में है। मुख्य मुद्दा राइट टू इन्फॉर्मेशन (RTI) एक्ट के साथ इसके टकराव को लेकर है। यह एक्ट, जो मई 2027 तक पूरी तरह लागू हो जाएगा, सख्त अनुपालन की मांग करता है, जिसमें प्रति उल्लंघन **₹250 करोड़** तक का जुर्माना हो सकता है। निवेशक और कंपनियां इस कानूनी विकास पर बारीकी से नजर रख रही हैं, क्योंकि यह भविष्य के डेटा गवर्नेंस और पारदर्शिता मानकों को तय करेगा।

डेटा प्राइवेसी और पारदर्शिता की जंग

भारत फिलहाल डेटा प्राइवेसी के मामले में एक बदलाव के दौर से गुजर रहा है, जहां डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023, चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है। जहां एक ओर यह एक्ट डेटा हैंडलिंग को आधुनिक बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है, वहीं दूसरी ओर यह सुप्रीम कोर्ट में गंभीर संवैधानिक जांच का सामना कर रहा है। एक्ट को पूरी तरह से 13 मई, 2027 तक लागू करने की समय-सीमा तय है, और इस कानूनी अनिश्चितता का माहौल कंपनियों और सरकारी क्षेत्रों दोनों के लिए एक जटिल स्थिति पैदा कर रहा है।

RTI के साथ टकराव का मुख्य मुद्दा

कानूनी बहस का केंद्रीय बिंदु नए डेटा सुरक्षा ढांचे और 2005 के राइट टू इन्फॉर्मेशन (RTI) एक्ट के बीच का संबंध है। आलोचक और कानूनी विशेषज्ञ DPDP एक्ट की धारा 44(3) को चुनौती दे रहे हैं, जो RTI एक्ट की धारा 8(1)(j) में संशोधन करती है। यह संशोधन प्रभावी रूप से यह बदलता है कि सार्वजनिक प्राधिकरणों द्वारा व्यक्तिगत जानकारी को कैसे संभाला जाएगा, जिससे एक व्यापक छूट मिलती है जिसे कुछ लोग पारदर्शिता और जवाबदेही को सीमित करने वाला मानते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कई जनहित याचिकाओं (Public Interest Litigations) को स्वीकार कर लिया है, और अब यह मूल्यांकन कर रहा है कि क्या ये बदलाव खुले शासन के सिद्धांतों और सरकारी डेटा तक आम जनता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं।

कंपनियों के लिए बढ़ते जोखिम

व्यावसायिक जगत के लिए, DPDP एक्ट महत्वपूर्ण परिचालन और वित्तीय जोखिम लाता है। कंपनियों को अब एक कठोर नियामक वातावरण से निपटना होगा, जहां गैर-अनुपालन के परिणामस्वरूप प्रति उल्लंघन ₹250 करोड़ तक के भारी जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है। इन जोखिमों से बचने के लिए, फिनटेक, बैंकिंग और ई-कॉमर्स जैसे क्षेत्रों की फर्में अपडेटेड कंसेंट मैनेजमेंट सिस्टम, डेटा गवर्नेंस प्रोटोकॉल और अनिवार्य ब्रीच रिपोर्टिंग मैकेनिज्म में निवेश कर रही हैं। भारत के डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड (Data Protection Board of India), जिसे नवंबर 2025 में इन नियमों की देखरेख के लिए स्थापित किया गया था, एक महत्वपूर्ण इकाई है जिसके साथ कंपनियों को अनुपालन समय-सीमा नजदीक आने पर जुड़ना होगा।

निगरानी तकनीक पर भी हो रही है समीक्षा

पारदर्शिता की बहस के समानांतर, सुप्रीम कोर्ट कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (चेहरे की पहचान तकनीक) के उपयोग की भी समीक्षा कर रहा है। याचिकाओं में तर्क दिया गया है कि सार्वजनिक विरोध स्थलों पर ऐसी निगरानी तैनाती के लिए कोई विशिष्ट वैधानिक ढांचा नहीं है और यह गोपनीयता मानकों का उल्लंघन कर सकती है, जो ऐतिहासिक के.एस. पुट्टस्वामी (K.S. Puttaswamy) निर्णय में स्थापित किए गए थे। यह निर्णय राज्य के हितों और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन के लिए एक गोल्ड स्टैंडर्ड बना हुआ है, और इसका उपयोग वर्तमान निगरानी प्रथाओं की वैधता का परीक्षण करने के लिए एक बेंचमार्क के रूप में किया जा रहा है।

भविष्य की राह

यह जारी न्यायिक प्रक्रिया सभी हितधारकों के लिए प्राथमिक निगरानी योग्य होगी। जैसे-जैसे सुप्रीम कोर्ट इन मामलों की सुनवाई करेगा, इसके परिणाम DPDP एक्ट के प्रावधानों में संशोधन या सख्त व्याख्या का कारण बन सकते हैं। निवेशकों और कॉर्पोरेट बोर्डों को RTI संशोधनों और निगरानी नियमों पर अदालत के रुख को ट्रैक करना चाहिए, क्योंकि ये निर्णय अनुपालन की अंतिम लागत और नए कानून के तहत अनुमत डेटा एक्सेस के दायरे को सीधे प्रभावित करेंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.