भारत का कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट 2019 आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर पूरी तरह तैयार नहीं है। कानून में स्पष्ट परिभाषाओं की कमी से फ्री AI टूल्स को लेकर जवाबदेही का बड़ा 'ब्लाइंड स्पॉट' बन गया है, जो आने वाले समय में कंपनियों के लिए कानूनी और प्रतिष्ठा से जुड़े जोखिम बढ़ा सकता है।
कानून और AI का बढ़ता अंतर
भारत का मौजूदा कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट 2019 उस समय तैयार किया गया था जब AI का इतना व्यापक दौर नहीं था। आज के समय में, विशेष रूप से 'फ्री' या 'फ्रीमियम' मॉडल पर चलने वाले AI टूल्स के लिए कानून में कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। इसका मतलब यह है कि अगर कोई AI टूल गलत जानकारी देता है या यूजर को वित्तीय नुकसान पहुँचाता है, तो कानूनी दांव-पेच काफी उलझ सकते हैं।
कंपनियों के लिए क्या है रिस्क?
निवेशकों के नजरिए से यह सिर्फ कानूनी बहस नहीं, बल्कि एक बड़ा बिजनेस रिस्क है। यदि कोई AI एजेंट नुकसान करता है, तो मौजूदा नियमों के तहत यह स्पष्ट नहीं है कि जिम्मेदारी किसकी होगी। जैसे-जैसे Department of Consumer Affairs और Ministry of Electronics and Information Technology इस पर सख्ती बढ़ाएंगे, कंपनियों को अपने डेटा गवर्नेंस और ऑडिट ट्रेल को और अधिक पारदर्शी बनाना होगा।
'Hallucinations' का खतरा
जो कंपनियां ग्राहकों की सहायता या फाइनेंशियल एडवाइस के लिए AI का इस्तेमाल कर रही हैं, उन्हें AI 'hallucinations' यानी गलत डेटा जनरेट करने की समस्या का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल कोई केंद्रीय AI कानून न होने के कारण, कंपनियों को खुद ही अपनी 'सेफ्टी गार्डरेल्स' तैयार करनी पड़ रही हैं।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
आने वाले महीनों में निवेशकों के लिए यह जानना जरूरी होगा कि कंपनियां अपने AI सुरक्षा उपायों को किस तरह लागू कर रही हैं। Reserve Bank of India जैसे रेगुलेटर्स पहले ही सेक्टर-विशिष्ट गाइडलाइंस की ओर बढ़ रहे हैं। शेयरधारकों को वार्षिक रिपोर्ट (Annual Reports) में कंपनी के 'liability disclosures' और उनके इंटरनल AI ऑडिट प्रोसेस पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है।
