ITAT बैंगलोर ने एक रिटायर्ड टीचर के खिलाफ जारी टैक्स रीअसेसमेंट ऑर्डर को रद्द कर दिया है। ट्रिब्यूनल ने माना कि इनकम टैक्स विभाग ने कानूनी समय सीमा (Legal Deadline) खत्म होने के बाद नोटिस जारी किया था, जो पूरी तरह अवैध है।
इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) बैंगलोर का यह फैसला टैक्स एडमिनिस्ट्रेशन में अनुशासन की अहमियत को दर्शाता है। मैसूर के एक रिटायर्ड टीचर के मामले में ट्रिब्यूनल ने साफ कर दिया है कि विभाग तय नियमों और डेडलाइन का उल्लंघन नहीं कर सकता।
क्या था पूरा मामला?
टैक्स विभाग के ऑटोमेटेड रिस्क मैनेजमेंट सिस्टम ने असेसमेंट ईयर 2015-16 के दौरान अकाउंट में ₹1.33 करोड़ के कैश डिपॉजिट को संदिग्ध पाया था। विभाग ने इसे अनडिस्क्लोज्ड इनकम मानकर रीअसेसमेंट शुरू किया और फरवरी 2024 में ₹48.85 लाख की आय पर टैक्स का आदेश पारित कर दिया।
डेडलाइन पर ट्रिब्यूनल की सख्ती
टैक्सपेयर ने ट्रिब्यूनल के सामने दलील दी कि विभाग ने कानून का पालन नहीं किया है। जांच में पाया गया कि इस असेसमेंट ईयर के लिए नोटिस भेजने की आखिरी तारीख 31 मार्च, 2022 थी। विभाग ने नोटिस 26 अप्रैल, 2022 को भेजा, जो डेडलाइन से 26 दिन देरी से था।
कानूनी नजीर (Precedent)
ITAT ने सुप्रीम कोर्ट और कर्नाटक हाई कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि समय सीमा बीत जाने के बाद जारी किया गया कोई भी नोटिस अमान्य है। इस देरी के कारण विभाग के पास केस दोबारा खोलने का अधिकार ही नहीं बचा और पूरा असेसमेंट ऑर्डर शून्य (void) करार दिया गया। यह फैसला स्पष्ट करता है कि चाहे ट्रांजैक्शन की वैल्यू कितनी भी बड़ी क्यों न हो, टैक्स अधिकारियों को भी कानूनी दायरों में रहकर ही काम करना होगा।
