Income Tax Appellate Tribunal (ITAT) Delhi ने एक स्थानीय फार्मासिस्ट के पक्ष में फैसला सुनाते हुए **₹3.32 करोड़** की टैक्स डिमांड को खारिज कर दिया है। यह मामला 2016 के नोटबंदी के दौरान किए गए कैश डिपॉजिट से जुड़ा था।
ITAT दिल्ली बेंच ने एक फार्मास्युटिकल रिटेलर को करीब एक दशक पुराने टैक्स विवाद से बड़ी राहत दी है। ट्रिब्यूनल ने 2016-17 की नोटबंदी के दौरान किए गए कैश डिपॉजिट पर लगाए गए ₹3.32 करोड़ के टैक्स एडिशन को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। टैक्स विभाग ने पहले इन डिपॉजिट्स को 'अनएक्सप्लेन्ड इनकम' (अघोषित आय) माना था, जिसे ट्रिब्यूनल ने अब गलत बताया है।
मजबूत डॉक्यूमेंटेशन की ताकत
विवाद का केंद्र नोटबंदी के दौरान जमा किया गया कैश था। टैक्सपेयर ने तर्क दिया कि यह पैसा पूरी तरह से वैध बिजनेस ऑपरेशंस और परिवार की बचत से आया है। अपने दावे को साबित करने के लिए फार्मासिस्ट ने ऑडिटेड बैलेंस शीट, प्रॉफिट एंड लॉस स्टेटमेंट और वैट (VAT) रिटर्न जैसे मजबूत सबूत पेश किए। ट्रिब्यूनल ने गौर किया कि टैक्स अधिकारियों ने इनकम टैक्स एक्ट की धारा 145 के तहत फार्मासिस्ट की अकाउंट बुक्स को कभी खारिज ही नहीं किया था।
जब अधिकारियों ने अकाउंट्स में कोई खास खामी नहीं निकाली, तो वे कैश डिपॉजिट के सोर्स को चुनौती देने का कानूनी आधार खो बैठे। ट्रिब्यूनल ने माना कि ₹1.64 करोड़ बिजनेस सेल्स से आए थे, जबकि बाकी रकम बैंक स्टेटमेंट और अन्य पारिवारिक रिकॉर्ड्स से साबित हो गई।
टैक्सपेयर्स के लिए बड़ा सबक
यह मामला हमें सिखाता है कि कैश ट्रांजैक्शंस के दौर में व्यवस्थित रिकॉर्ड रखना कितना जरूरी है। अगर आपके पास वैट फाइलिंग, सेल्स इनवॉइस और बैंक स्टेटमेंट्स का एक स्पष्ट ऑडिट ट्रेल है, तो विभाग के लिए आपके पैसे को 'अघोषित आय' बताना बहुत मुश्किल होता है। यह फैसला छोटे बिजनेस मालिकों के लिए एक रिमाइंडर है कि सही रिकॉर्ड-कीपिंग ही टैक्स स्क्रूटनी के दौरान सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है।
