Income Tax Appellate Tribunal (ITAT) Chandigarh ने **₹6.36 करोड़** के कैपिटल गेन्स विवाद में करदाताओं को बड़ी राहत दी है। ट्रिब्यूनल ने साफ किया है कि टैक्स छूट का दावा करते समय प्रॉपर्टी का 'वास्तविक कमर्शियल इस्तेमाल' कागजी वर्गीकरण से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
ITAT चंडीगढ़ ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जो कैपिटल गेन्स टैक्स विवादों से जूझ रहे करदाताओं के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। यह मामला पंचकूला के एक निवासी से जुड़ा है, जिसने 2017 में अपनी पुश्तैनी कृषि भूमि ₹8 करोड़ में बेची थी। इस बिक्री के बाद टैक्स विभाग ने ₹6.36 करोड़ की भारी-भरकम टैक्स डिमांड खड़ी कर दी थी, जिसे अब ट्रिब्यूनल ने खारिज कर दिया है।
क्या था पूरा विवाद?
टैक्स विभाग ने सेक्शन 54F के तहत मिलने वाली छूट पर सवाल उठाए थे। विभाग का तर्क था कि करदाता के पास जीरकपुर में पहले से एक प्रॉपर्टी मौजूद है, जिसे वे 'रेसिडेंशियल' मानते थे, इसलिए वह नई छूट का हकदार नहीं है। हालांकि, करदाता ने तर्क दिया कि वह प्रॉपर्टी पूरी तरह से कमर्शियल ऑफिस और रेस्टोरेंट के तौर पर इस्तेमाल हो रही है।
ट्रिब्यूनल का रुख: कागजों से ऊपर 'वास्तविक उपयोग'
मामले की गंभीरता को देखते हुए ITAT ने धाकोली (जीरकपुर) स्थित प्रॉपर्टी का फिजिकल इंस्पेक्शन करवाया। ट्रिब्यूनल ने पाया कि वह जगह वाकई कमर्शियल जोन में है और व्यावसायिक काम के लिए ही इस्तेमाल की जा रही है। इसके बाद, ट्रिब्यूनल ने ₹2.64 करोड़ की डिसअलाउंस (disallowance) को हटा दिया और स्पष्ट किया कि कमर्शियल प्रॉपर्टी होने पर सेक्शन 54F की पाबंदियां लागू नहीं होतीं।
इसके अलावा, विभाग ने सेक्शन 54B के तहत नई कृषि भूमि की खरीद पर भी आपत्ति जताई थी, क्योंकि वह शहरी क्षेत्र में थी। ट्रिब्यूनल ने इस दलील को भी खारिज कर दिया और ₹1.25 करोड़ के निवेश पर छूट को बरकरार रखा।
निवेशकों के लिए सबक
यह फैसला साफ संकेत देता है कि अगर आप कैपिटल गेन्स छूट का दावा कर रहे हैं, तो अपने पास पुख्ता दस्तावेज जरूर रखें। बिजली के बिल, बिजनेस रजिस्ट्रेशन या कमर्शियल जोन का प्रमाण ही भविष्य में टैक्स विभाग की मनमानी से आपको बचा सकते हैं।
