Income Tax Appellate Tribunal (ITAT) ने पांच जमीन मालिकों के पक्ष में फैसला सुनाया है। ट्रिब्यूनल ने टैक्स चोरी के आरोपों को खारिज करते हुए पार्टनरशिप फर्म की वैधता को बरकरार रखा है और कैपिटल गेन्स टैक्स के लिए साल **2005** को ही आधार माना है।
बेंगलुरु स्थित इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) ने रियल एस्टेट विकास से जुड़े टैक्स विवादों पर एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। ट्रिब्यूनल ने उन पांच जमीन मालिकों के पक्ष में फैसला सुनाया है जिन पर पार्टनरशिप फर्म के जरिए रेंटल इनकम छुपाने का आरोप था। यह मामला उन निवेशकों के लिए एक बेंचमार्क साबित हो सकता है जो फॉर्मल पार्टनरशिप स्ट्रक्चर के तहत प्रॉपर्टी का प्रबंधन करते हैं।
विवाद की जड़ और आईटीएटी का रुख
इनकम टैक्स डिपार्टमेंट का तर्क था कि पार्टनरशिप फर्म केवल टैक्स बचाने का एक तरीका है। विभाग ने दलील दी कि पार्टनर्स का फर्म से पैसा निकालना यह साबित करता है कि किराया वास्तव में उनकी निजी आय थी। हालांकि, ITAT ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया। ट्रिब्यूनल ने माना कि फर्म का अपना बैंक अकाउंट था, नियमित टैक्स रिटर्न फाइल किए गए और इसे एक स्पेशल इकोनॉमिक जोन (SEZ) के को-डेवलपर के रूप में मान्यता प्राप्त थी।
कैपिटल गेन्स टैक्स पर बड़ी राहत
टैक्स विभाग ने 2016-17 असेसमेंट ईयर के आधार पर टैक्स वसूलने की कोशिश की थी, जो कि IT पार्क के पूरा होने का समय था। जमीन मालिकों ने तर्क दिया कि प्रॉपर्टी का ट्रांसफर 2005 में ही हो गया था, जब जॉइंट डेवलपमेंट एग्रीमेंट (JDA) पर हस्ताक्षर किए गए थे। ITAT ने इस तर्क को सही माना और साफ कर दिया कि नियंत्रण का ट्रांसफर 2005 में ही हो चुका था, जिससे मालिकों को बाद की तारीखों पर लगने वाले भारी टैक्स से राहत मिली।
निवेशकों के लिए सबक
यह फैसला स्पष्ट करता है कि यदि एग्रीमेंट सही ढंग से निष्पादित हैं और पार्टनरशिप फर्म अपने वित्तीय रिकॉर्ड पारदर्शी तरीके से बनाए रखती है, तो टैक्स अधिकारी मनमाने ढंग से आय को री-क्लासिफाई नहीं कर सकते। हालांकि, यह फैसला इस बात की चेतावनी भी है कि कागजी कार्रवाई में ढिलाई नहीं बरती जानी चाहिए। जटिल डेवलपमेंट एग्रीमेंट्स में टैक्स ऑडिट के दौरान अक्सर ट्रांसफर की तारीख विवाद का विषय बनी रहती है, इसलिए सभी वित्तीय दस्तावेजों का व्यवस्थित होना जरूरी है।
