इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (IBBI) के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, पर्सनल गारंटी से जुड़े मामलों में लेनदारों (creditors) को उनके दावों (claims) का महज़ **1%** ही वापस मिला है। **5,000** से ज़्यादा आवेदन आने के बावजूद, सिर्फ **64** रीपेमेंट प्लान (repayment plans) को मंजूरी मिली है, जो इस रिकवरी मैकेनिज्म की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है।
पर्सनल गारंटी से रिकवरी में बड़ी अड़चनें
इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत पर्सनल गारंटी को लागू करने की प्रक्रिया में बड़ी चुनौतियाँ सामने आ रही हैं। IBBI के अगस्त 2026 तक के आंकड़ों से पता चलता है कि पर्सनल गारंटी के मामलों में रिकवरी दर 1% के बेहद निचले स्तर पर है।
दिसंबर 2019 से अब तक, लेनदारों ने 5,186 ऐसे आवेदन किए हैं जहाँ उन्होंने पर्सनल गारंटी को लागू करने की मांग की है। यह एक ऐसा तरीका है जिसे अक्सर तब अपनाया जाता है जब किसी कंपनी की इंसॉल्वेंसी (insolvency) के समाधान से पूरा कर्ज़ वसूल नहीं हो पाता। लेकिन, आवेदन करने से लेकर असल रिकवरी तक का सफर बहुत धीमा रहा है। 2,137 मामलों में ही रेज़ोल्यूशन प्रोफेशनल्स (resolution professionals) नियुक्त किए गए हैं। चिंता की बात यह है कि इनमें से केवल 64 मामलों में ही रीपेमेंट प्लान को मंजूरी मिली है। इन प्लान्स के ज़रिए कुल ₹235 करोड़ की वसूली हुई है, जो प्रति केस औसतन ₹3.7 करोड़ है, जबकि दावों की रकम कहीं ज़्यादा थी।
बैंकों के लिए चिंता का सबब
यह आंकड़े भारतीय बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करते हैं। ये बताते हैं कि प्रमोटर्स को कंपनियों के कर्ज़ के लिए जवाबदेह ठहराना कितना मुश्किल हो रहा है। कई मामलों में, बड़ी कंपनियों के हाई-प्रोफाइल प्रमोटर्स ने स्टील और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टरों में लोन लेने के लिए ये गारंटी दी थी। जब ये कंपनियाँ वित्तीय संकट में फँसीं, तो बैंकों को उम्मीद थी कि पर्सनल गारंटी एक सहायक सुरक्षा कवच का काम करेगी। लेकिन, वर्तमान में रिकवरी की कम दर बताती है कि इन गारंटी को अमल में लाना उम्मीद से ज़्यादा कठिन साबित हो रहा है।
कम रिकवरी के पीछे की वजहें
इस कम रिकवरी के कई कारण हैं। कानूनी प्रक्रिया अक्सर जटिल होती है, जिसमें कॉर्पोरेट और पर्सनल इंसॉल्वेंसी कानूनों का घालमेल होता है। ट्रिब्यूनल में केस दर्ज होने में लगातार देरी भी एक बड़ी समस्या है, जिससे कई बार संपत्ति लेनदारों द्वारा दावा किए जाने से पहले ही हस्तांतरित या बंधक बना ली जाती है। इसके अलावा, व्यक्तिगत गारंटी देने वालों की संपत्ति का सत्यापन करना, खासकर जब वह अलग-अलग जगहों पर फैली हो या जटिल संरचनाओं के ज़रिए रखी गई हो, रिकवरी की प्रक्रिया को और मुश्किल बना देता है।
हालांकि IBC ने कई प्रमोटर्स के लिए एक निवारक (deterrent) के रूप में काम किया है, जिससे हज़ारों अन्य मामलों में मामले वापस लिए गए या सुलझाए गए, पर्सनल गारंटी के मामलों में वास्तविक नकदी की वसूली एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है। बैंकों और लेनदारों के लिए, आगे की निगरानी का मुख्य बिंदु यह होगा कि क्या कोई और नियामक (regulatory) या न्यायिक स्पष्टीकरण (judicial clarification) समाधान प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने और रीपेमेंट प्लान की मंजूरी में तेज़ी लाने में मदद करता है। बैंकिंग सेक्टर के निवेशक शायद इन रिकवरी दरों के विकास पर करीब से नज़र रखेंगे, क्योंकि यह सीधे तौर पर बैड लोंस (bad loans) के राइट-बैक (write-back) की संभावना को प्रभावित करता है।
