Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) ने दिवाला प्रक्रिया (Insolvency process) के संभावित दुरुपयोग को पकड़ने के लिए **6** बड़े रेड फ्लैग्स जारी किए हैं। अब रेजोल्यूशन प्रोफेशनल्स (RPs) को संदिग्ध डेट असाइनमेंट और टैक्स चोरी जैसे मामलों में अधिक सतर्कता बरतनी होगी।
रेगुलेटर ने क्यों लिया ये फैसला?
IBBI ने स्पष्ट किया है कि दिवाला प्रक्रिया का इस्तेमाल अब संपत्तियों को छिपाने, जांच से बचने या टैक्स लायबिलिटी से बचने के लिए नहीं किया जा सकेगा। रेगुलेटर के पास ऐसी कई शिकायतें आ रही थीं, जिनमें इनसॉल्वेंसी फ्रेमवर्क का गलत फायदा उठाए जाने के संकेत मिले थे। अब, रेजोल्यूशन प्रोफेशनल्स (RPs) को केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित न रहकर इन 6 प्रमुख संकेतों पर पैनी नजर रखनी होगी:
- संदिग्ध डेट असाइनमेंट: दिवाला प्रक्रिया शुरू होने से पहले किसी एक नॉन-बैंक क्रेडिटर को कर्ज ट्रांसफर करना।
- एक साथ कई केस: एक ही प्रमोटर से जुड़ी कई कंपनियों का एक साथ दिवाला प्रक्रिया में जाना।
- रिकवरी वैल्यू में कमी: कंपनियों की देनदारी के मुकाबले बहुत कम रिकवरी प्लान पेश करना।
- रिलेटेड-पार्टी राइट-ऑफ: आपस से जुड़ी कंपनियों के एडवांसेज को अचानक राइट-ऑफ (Write-off) करना।
- धोखाधड़ी की जांच: यदि कंपनी किसी अन्य सरकारी एजेंसी द्वारा फ्रॉड जांच के दायरे में हो।
- कंपटीशन की कमी: रेजोल्यूशन प्लान में किसी भी अन्य बोलीदाता (Bidder) का उत्साह न दिखाना।
निवेशकों और क्रेडिटर्स पर क्या असर होगा?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस सख्ती से रेजोल्यूशन प्रोसेस में पारदर्शिता तो बढ़ेगी, लेकिन मामलों के निपटारे में समय लग सकता है। Essel Group के संस्थापक Subhash Chandra से जुड़े पर्सनल इनसॉल्वेंसी मामलों ने पहले ही इस सेक्टर में क्रेडिटर कंट्रोल पर बहस छेड़ दी थी।
हालांकि, चुनौतियां बरकरार हैं। रेजोल्यूशन प्रोफेशनल्स का कहना है कि वे फाइनेंशियल बुक्स की जांच तो कर सकते हैं, लेकिन वे फॉरेंसिक इन्वेस्टिगेटर नहीं हैं। ऐसे में प्रमोटर्स और बाहरी संस्थाओं से जानकारी जुटाना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी। आने वाले समय में, कानूनी विवादों में इजाफा हो सकता है, क्योंकि कंपनियां नए नियमों के तहत अपने पुनर्गठन (Restructuring) प्लान को लेकर और अधिक सवालों के घेरे में होंगी।
