गौतम बुद्ध नगर की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट मेधा रूपम ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। मामला एक छात्रा की अवैध हिरासत के लिए **₹5 लाख** का जुर्माना भरने का है, जिसे अधिकारियों की निजी सैलरी से वसूलने का आदेश दिया गया था।
यह कानूनी विवाद अप्रैल 2026 की एक घटना से जुड़ा है, जब छात्रा आकृति चौधरी को नोएडा में हुए प्रदर्शनों के बाद नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत हिरासत में ले लिया गया था। 2 सितंबर 2026 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस हिरासत को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस गिरफ्तारी के पीछे की प्रशासनिक कार्रवाई को 'मनगढ़ंत' और 'निरंकुश' बताया था। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत छात्रा के मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। सजा के तौर पर कोर्ट ने ₹5 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया, जो डीएम और संबंधित पुलिस अधिकारियों की व्यक्तिगत सैलरी से काटा जाना था।
सर्विस रिकॉर्ड पर असर
वित्तीय जुर्माने के अलावा, हाई कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि डीएम और पुलिस अधिकारियों के गलत आचरण की रिपोर्ट उनके सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज की जाए। यह फैसला प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। अब सुप्रीम कोर्ट का रुख यह तय करेगा कि प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल और व्यक्तिगत जवाबदेही के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, जो आने वाले समय में सरकारी अधिकारियों के लिए एक बड़ा मिसाल बन सकता है।
