Fortis Healthcare ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें कंपनी के पुराने ट्रांजैक्शंस का **6 महीने** तक फॉरेंसिक ऑडिट करने का निर्देश दिया गया था। कंपनी का कहना है कि वह ऑरिजनल आर्बिट्रेशन का हिस्सा नहीं थी, इसलिए यह ऑडिट पूरी तरह से जांच का विषय है।
कानूनी दांव-पेंच और सुप्रीम कोर्ट में याचिका
Fortis Healthcare ने 16 सितंबर, 2026 को सुप्रीम कोर्ट में एक स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दायर की है। यह कदम दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ है, जिसमें 31 अगस्त, 2026 को कंपनी के पुराने फाइनेंशियल रिकॉर्ड्स की 6 महीने लंबी फॉरेंसिक जांच का आदेश दिया गया था।
क्या है विवाद की जड़?
यह मामला जापानी दवा कंपनी Daiichi Sankyo द्वारा जीते गए एक पुराने आर्बिट्रेशन अवॉर्ड के एनफोर्समेंट से जुड़ा है। इस विवाद का सीधा संबंध Fortis के पूर्व प्रमोटर्स, मलविंदर मोहन सिंह और शिविंदर मोहन सिंह से है। इस ऑडिट का मुख्य उद्देश्य कंपनी के शेयरों और फंड्स के लेनदेन की जांच करना है, जिसमें Fortis के साथ-साथ IHH Healthcare Berhad और RHT Health Trust के ऐतिहासिक कनेक्शन शामिल हैं।
कंपनी का क्या है पक्ष?
Fortis का स्पष्ट कहना है कि वह Daiichi Sankyo और पूर्व प्रमोटर्स के बीच हुए विवाद में कभी भी पार्टी नहीं थी। कंपनी ने साफ किया है कि कोर्ट का यह ऑडिट आदेश फिलहाल किसी भी तरह की नई फाइनेंशियल लायबिलिटी या जुर्माना नहीं लगाता है। यह केवल एक इंवेस्टिगेटिव एक्सरसाइज है।
निवेशकों के लिए जोखिम और मार्केट का हाल
बाजार में इस खबर का असर फिलहाल काफी सीमित दिखा है और शेयर करीब ₹870 के स्तर पर ट्रेड कर रहा है। निवेशकों के लिए सबसे बड़ा रिस्क तत्काल फाइनेंशियल लॉस नहीं, बल्कि यह 'रेगुलेटरी ओवरहैंग' है। भविष्य में अगर फॉरेंसिक जांच में कुछ निकलता है, तो यह मैनेजमेंट का फोकस मुख्य हॉस्पिटल ऑपरेशन्स से भटका सकता है।
अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकी हैं। क्या कोर्ट ऑडिट पर रोक लगाएगा या जांच तय समय सीमा में जारी रहेगी? निवेशकों को अब कोर्ट की अगली सुनवाई और कंपनी की ओर से आने वाले किसी भी नए डिस्क्लोजर पर बारीक नजर रखनी होगी।
