सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस वी. गोपाल गौड़ा ने **27 मई, 2026** के उस फैसले को वापस लेने की मांग की है, जिसमें इलेक्शन कमीशन (ECI) के वोटर रोल रिवीजन को सही ठहराया गया था। उन्होंने आरोप लगाया है कि कमीशन ने अदालत के सामने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया।
पूर्व जस्टिस वी. गोपाल गौड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में औपचारिक रूप से मांग की है कि वह 27 मई, 2026 के अपने उस पुराने आदेश को वापस ले, जिसमें इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया (ECI) की 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) प्रक्रिया को मंजूरी दी गई थी। इस मामले ने देश में चुनावी प्रक्रियाओं और संवैधानिक प्रोटोकॉल को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।
गंभीर आरोप और कानूनी तर्क
जस्टिस गौड़ा का तर्क है कि इलेक्शन कमीशन ने अपने आंतरिक फैसलों में पारदर्शिता नहीं बरती। उन्होंने आरोप लगाया कि कमीशन ने इस पूरी रिविजन प्रक्रिया को चलाने से पहले पूरी बॉडी की औपचारिक सहमति नहीं ली, जो कि एक बड़ी प्रशासनिक चूक है। उनके अनुसार, कोर्ट को इस मामले में गलत तथ्य बताकर गुमराह किया गया है। अब वे चाहते हैं कि कमीशन के आंतरिक रिकॉर्ड्स की गहराई से जांच हो ताकि यह पता चल सके कि क्या वास्तव में संवैधानिक नियमों का पालन हुआ था या नहीं।
रिटायर्ड जजों के बीच मतभेद
यह मुद्दा न्यायिक जगत में भी बंट गया है। जहां जस्टिस गौड़ा इस फैसले को रद्द करने की मांग कर रहे हैं, वहीं 42 रिटायर्ड जजों ने एक ओपन लेटर जारी कर इलेक्शन कमीशन का बचाव किया है। उनका मानना है कि यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए एक जरूरी प्रशासनिक कदम था।
निवेशकों के लिए क्या है मतलब?
बाजार के निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि यह मामला पूरी तरह से संवैधानिक और कानूनी है। इसका किसी भी लिस्टेड कंपनी की कमाई, शेयर बाजार की अस्थिरता या कॉर्पोरेट सेक्टर पर कोई सीधा असर नहीं पड़ने वाला है। फाइनेंशियल मार्केट्स अपने तय मैक्रो-इकोनॉमिक इंडिकेटर्स और कॉर्पोरेट परफॉरमेंस के आधार पर ही चलेंगे। इसलिए, निवेशकों को इसे बाजार से जुड़ी खबर के बजाय केवल कानून और व्यवस्था से जुड़ा मामला मानना चाहिए।
