सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस संजय किशन कौल ने पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ को लेकर अपनी हालिया टिप्पणियों पर सफाई दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका विरोध न्यायिक प्रदर्शन के बजाय जजों की नियुक्ति में होने वाली प्रशासनिक देरी से जुड़ा है।
दिसंबर 2023 में रिटायर हुए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस संजय किशन कौल ने अपनी किताब 'Without Fear or Favour' में प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका यह रुख अदालती फैसलों की गुणवत्ता पर नहीं, बल्कि जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर है।\n\n### कॉलेजियम की स्वायत्तता पर जोर\n\nजस्टिस कौल का मानना है कि कॉलेजियम को सरकार के साथ परामर्श शुरू करने से पहले उम्मीदवारों की सूची पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से तैयार करनी चाहिए। उनका तर्क है कि कार्यपालिका के साथ अनौपचारिक चर्चा से ऐसी परंपराएं स्थापित हो सकती हैं, जो भविष्य के मुख्य न्यायाधीशों की स्वायत्तता को कमजोर कर सकती हैं।\n\n### नियुक्तियों में देरी और रिक्तियां\n\nजस्टिस कौल ने बताया कि प्रशासनिक खामियों के कारण सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट्स में जजों के पद खाली पड़े हैं। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि जुलाई में कॉलेजियम की प्रक्रिया में अंतिम समय में किए गए बदलावों और वरिष्ठता के मुद्दों पर असहमति के चलते उन्होंने कुछ बैठकों से दूरी बना ली थी।\n\n### आर्थिक और कानूनी स्थिरता का महत्व\n\nहालांकि जस्टिस कौल ने प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका सरकार के खिलाफ मामलों में अपनी पूरी आजादी बरकरार रखती है। निवेशकों और कारोबारियों के लिए न्यायपालिका का सुचारू रूप से काम करना बेहद जरूरी है, क्योंकि अदालती नियुक्तियों में देरी से पेंडेंसी बढ़ती है, जिसका सीधा असर कमर्शियल विवादों के निपटारे पर पड़ता है। आने वाले समय में कॉलेजियम की कार्यक्षमता ही न्यायिक प्रणाली की मजबूती तय करेगी।
