भारत सरकार ने फास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) की स्कीम को 30 सितंबर, 2026 तक बढ़ा दिया है। फिलहाल 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 775 ऐसी कोर्ट काम कर रही हैं। हालांकि, गंभीर अपराधों और परीक्षा पर्चा लीक जैसे जरूरी मामलों में न्याय की गति तेज करने के बावजूद, संसाधनों के पुन: आवंटन और फंडिंग में असमानता जैसी संरचनात्मक बाधाएं अभी भी उनकी कार्यक्षमता को चुनौती दे रही हैं।
जजों की कमी और फंड का खेल
भारत सरकार ने फास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) स्कीम को 30 सितंबर, 2026 तक आगे बढ़ा दिया है। ये कोर्ट खास तौर पर रेप और POCSO एक्ट के तहत आने वाले मामलों को सुलझाने के लिए बनाई गई हैं, ताकि लंबित मामलों का बोझ कम किया जा सके। अभी देश भर में 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 775 कोर्ट इस स्कीम के तहत काम कर रही हैं।
'पेंडेंसी डिस्प्लेसमेंट' की समस्या
विश्लेषकों का कहना है कि इन कोर्ट्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती 'पेंडेंसी डिस्प्लेसमेंट' की है। इसका मतलब है कि नई न्यायिक क्षमता बनाने की बजाय, सिस्टम अक्सर मौजूदा जजों और स्टाफ को ही इन फास्ट-ट्रैक बेंचों पर भेज देता है। नतीजतन, कुछ मामले भले ही जल्दी निपट जाएं, लेकिन नियमित अदालतों में लंबित मामलों का बोझ बढ़ सकता है, क्योंकि जजों और कर्मचारियों की कुल संख्या जरूरत के हिसाब से काफी कम है।
फंडिंग का बंटवारा और जमीनी हकीकत
कोर्ट्स के रख-रखाव की फंडिंग का ढांचा भी एक बड़ी समस्या है। साल 2011 से, इन अदालतों का वित्तीय बोझ केंद्र सरकार से राज्यों पर डाल दिया गया। इस बदलाव के कारण राज्यों में इन कोर्ट्स के कामकाज में भारी अंतर देखा जा रहा है। जिन राज्यों की आर्थिक स्थिति अच्छी है, वहां बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और परफॉर्मेंस देखने को मिलती है, जबकि कमजोर बजट वाले राज्यों में सुविधाओं और स्टाफ की कमी से जूझना पड़ता है।
कोर्ट के बाहर भी कई अड़चनें हैं। फोरेंसिक लैबोरेटरी, जांच एजेंसियां और अभियोजन पक्ष (Prosecution Office) अक्सर कोर्ट की समय-सीमा के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। भले ही कोर्ट किसी मामले को सुनने के लिए तैयार हो, लेकिन फोरेंसिक रिपोर्ट में देरी या गवाहों की अनुपलब्धता के कारण वही देरी हो जाती है, जिसे फास्ट-ट्रैक सिस्टम खत्म करने के लिए बनाया गया था।
बिजनेस और निवेश पर असर
निवेशकों और कारोबारियों के लिए, न्यायिक व्यवस्था की रफ्तार 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' का एक अहम पैमाना है। खासकर कॉन्ट्रैक्ट लागू करवाना, प्रॉपर्टी के अधिकार और नियमों का पालन जैसी चीजों में तेजी और भरोसेमंद समाधान कारोबार की लागत और निवेशकों के विश्वास को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं। जब कानूनी प्रक्रियाएं धीमी या अप्रत्याशित होती हैं, तो यह लंबी अवधि के निवेश के लिए जोखिम को बढ़ा देता है।
सरकार ने हाल ही में परीक्षा पर्चा लीक जैसे जरूरी प्रशासनिक मामलों को सुलझाने के लिए भी फास्ट-ट्रैक तरीकों का इस्तेमाल किया है, जो इस मॉडल पर निर्भरता दिखाता है। भविष्य में, इन कोर्ट्स की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार अस्थायी उपायों से हटकर स्थायी क्षमता निर्माण की ओर कदम बढ़ा पाती है या नहीं। निवेशक और कानूनी जानकार इस बात पर नजर रखेंगे कि क्या आने वाले समय में जजों की संख्या बढ़ाने और फोरेंसिक व जांच इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाने पर ध्यान दिया जाता है, या सिर्फ मौजूदा अदालतों को कुछ और समय के लिए जारी रखा जाता है।
