प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने जितेश गुप्ता नाम के एक इंंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि उसने Best Foods के कॉर्पोरेट इंंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) में हेरफेर किया। यह गिरफ्तारी कंपनी से जुड़े ₹1,740.30 करोड़ के बैंक फ्रॉड की चल रही जांच का हिस्सा है।
मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत गिरफ्तारी
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने जितेश गुप्ता, जो एक इंंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल हैं, को Best Foods Ltd. के कॉर्पोरेट इंंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) में धांधली करने के आरोप में गिरफ्तार किया है। प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत हुई यह गिरफ्तारी, कंपनी से जुड़े एक बड़े वित्तीय धोखाधड़ी मामले की जांच में नया मोड़ लाती है।
बैंक फ्रॉड केस से जुड़ाव
यह कार्रवाई 2020 से जांच के दायरे में आए ₹1,740.30 करोड़ के बैंक फ्रॉड की व्यापक जांच का हिस्सा है। ED पहले ही अगस्त 2025 में Best Foods के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर दिनेश गुप्ता को गिरफ्तार कर चुकी है। उन पर आरोप है कि उन्होंने लोन की रकम को कई शेल कंपनियों के ज़रिए डायवर्ट किया था। ED अब तक ₹266.58 करोड़ की संपत्ति अटैच कर चुकी है ताकि फंड की कथित हेराफेरी से हुए नुकसान की भरपाई की जा सके।
प्रक्रिया में हेरफेर के आरोप
जितेश गुप्ता के खिलाफ जांच उनके Best Foods और उससे जुड़ी कंपनियों के रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल के तौर पर किए गए कामों पर केंद्रित है। जांच एजेंसी का दावा है कि उन्होंने पूर्व मैनेजमेंट को फायदा पहुंचाने के लिए इंंसॉल्वेंसी प्रक्रिया में हेरफेर किया। ED के अनुसार, गुप्ता ने कथित तौर पर उन दावों को फिर से स्वीकार किया जिन्हें धोखाधड़ी के चलते पहले खारिज कर दिया गया था। इससे क्रेडिटर कमेटी (Committee of Creditors) की संरचना बदल गई। आरोप है कि इस हेरफेर से एक ऐसा रिजॉल्यूशन प्लान तैयार हुआ, जिसे एजेंसी एक मुखौटा बता रही है, जिसका मकसद पूर्व प्रमोटरों का प्रॉक्सी के ज़रिए कंपनी पर फिर से नियंत्रण हासिल करना था।
NCLT की पुरानी टिप्पणियां
इंंसॉल्वेंसी प्रक्रिया में अनियमितताएं कोई नई बात नहीं है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने सितंबर 2025 में ही गुप्ता के आचरण पर प्रतिकूल टिप्पणियां की थीं। ट्रिब्यूनल ने पाया था कि गुप्ता ने अपने कानूनी अधिकार से बढ़कर काम किया और अविश्वसनीय दस्तावेजों पर भरोसा किया। नतीजतन, ED द्वारा हाल ही में गिरफ्तारी से काफी पहले, ट्रिब्यूनल ने मामले से उन्हें हटाने का आदेश दिया था।
क्रेडिटर्स पर असर
निवेशकों और क्रेडिटर्स के लिए, ऐसी घटनाएं इंंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रक्रिया की गति और प्रभावशीलता को लेकर अनिश्चितता पैदा करती हैं। जब एक इंंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल की ईमानदारी पर सवाल उठता है, तो इससे रिजॉल्यूशन की समय-सीमा में बड़ी देरी, कानूनी बाधाएं और क्रेडिटर्स के लिए लागत बढ़ सकती है। यह मामला दिवालियापन की कार्यवाही से जुड़े जोखिमों को उजागर करता है, खासकर जब पूर्व प्रबंधन और इंंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन के लिए जिम्मेदार लोगों के बीच मिलीभगत हो सकती है। बाज़ार प्रतिभागी और क्रेडिटर्स आमतौर पर रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल की नियुक्ति और ट्रिब्यूनल के आदेशों की निगरानी करते हैं ताकि ऐसे रिकवरी प्रोसेस की स्थिरता और पारदर्शिता का आकलन किया जा सके। इस मामले की जांच जारी है और जितेश गुप्ता आगे की पूछताछ के लिए ED की हिरासत में हैं।
