Delhi High Court ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि Maternity Leave के बाद महिलाओं को उनके पुराने या समकक्ष रोल पर ही वापस लाना होगा। HashiCorp के एक मामले में कोर्ट ने कंपनी पर **₹10 लाख** का जुर्माना भी लगाया है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने काम पर लौटने वाली महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया है कि Maternity Benefit Act, 1961 का मतलब सिर्फ सैलरी या डेजिग्नेशन बरकरार रखना नहीं है, बल्कि महिला को वही अधिकार और पावर वापस देना है जो वह छुट्टी पर जाने से पहले इस्तेमाल कर रही थी। यदि पुरानी भूमिका उपलब्ध नहीं है, तो कंपनी को ऐसी जिम्मेदारी देनी होगी जिसमें काम का स्तर और निर्णय लेने की शक्ति समान हो।
HashiCorp मामले में सख्त रुख
यह मामला एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) की याचिका के बाद सामने आया, जिन्हें मेटरनिटी लीव से लौटने के बाद नाममात्र का काम सौंप दिया गया था। कोर्ट ने HashiCorp को फटकार लगाते हुए ₹10 लाख का मुआवजा और ₹1.5 लाख की कानूनी लागत भरने का आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मातृत्व (Motherhood) को करियर में किसी भी तरह की रुकावट या नुकसान का आधार नहीं बनाया जा सकता।
कॉर्पोरेट जगत पर क्या असर होगा?
यह फैसला भारतीय कंपनियों के लिए HR नियमों में बड़े बदलाव का संकेत है। अब कंपनियां सिर्फ सैलरी देकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकेंगी। यदि किसी महिला कर्मचारी का रोल बदला जाता है, तो कंपनी को साबित करना होगा कि यह एक वाजिब व्यावसायिक जरूरत थी। जो कंपनियां अपने आंतरिक नियमों में सुधार नहीं करेंगी, उन्हें कानूनी और वित्तीय जोखिम का सामना करना पड़ सकता है।
सरकारी गाइडलाइन्स की तैयारी
कोर्ट ने केंद्र सरकार को अगले 6 महीनों के भीतर काम पर वापसी (Reintegration) के लिए एक व्यापक फ्रेमवर्क तैयार करने का निर्देश दिया है। इसमें क्रेच फैसिलिटी और शिकायत निवारण प्रक्रिया जैसे जरूरी सुधार शामिल होंगे, जिससे कंपनियों का परिचालन खर्च (Operational Cost) बढ़ सकता है। निवेशकों के लिए अब यह देखना अहम होगा कि कंपनियां अपनी भर्ती और प्रमोशन नीतियों को इस न्यायिक मिसाल के साथ कैसे अलाइन करती हैं।
